किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल की है। केजीएमयू के नेत्र रोग विभाग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और 3डी प्रिंटिंग की मदद से ऐसा कस्टमाइज्ड पीएलए इम्प्लांट तैयार किया है, जो नेत्रहीन बच्चों, विशेषकर रेटिनोब्लास्टोमा (आंख का कैंसर) से पीड़ित मासूमों के लिए वरदान साबित होगा।
इस शोध की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बेहद कम लागत है। जहां वर्तमान में एक कृत्रिम आंख लगवाने का खर्च लगभग 1000 रुपये आता है, वहीं इस नई तकनीक से इसे 10 रुपये से भी कम में तैयार किया जा सकेगा। यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि पारंपरिक इम्प्लांट की तुलना में अधिक सटीक और बेहतर फिटिंग वाली है।
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कॉस्मेटिक हीनभावना से मिलेगी मुक्ति
विभागाध्यक्ष प्रो. अपजित कौर ने बताया कि दुर्घटना, कैंसर या जन्मजात विकारों के कारण जब किसी बच्चे की आंख निकालनी पड़ती है, तो चेहरे पर खालीपन आ जाता है। इससे बच्चों में हीनभावना पैदा होती है। विभाग में संचालित ऑक्युलोप्लास्टी क्लीनिक 1000 रुपये में कृत्रिम आंख बनती है, मगर अब इस तकनीक से मरीजों को और राहत मिलेगी। यह नया 3डी प्रिंटेड इम्प्लांट आईबॉल की कमी को इस तरह पूरा करता है कि चेहरा सामान्य दिखता है, जिससे मरीज का आत्मविश्वास बढ़ता है।
इन्होंने किया शोध: इस महत्वपूर्ण शोध को नेत्र रोग विभाग की एमएस छात्रा डॉ. शिवानी सुरेश ने प्रो. संजीव कुमार गुप्ता के मार्गदर्शन में पूरा किया। इस प्रोजेक्ट में डॉ. अरुण कुमार शर्मा, प्रो. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. विशाल कटियार का भी विशेष सहयोग रहा।
