Krishna Janmashtami in Rohini Nakshatra on 26th August

कृष्ण जन्माष्टमी की झांकी
– फोटो : instagram

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इस बार श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर द्वापर युग जैसा संयोग बन रहा है, जब भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। रोहिणी नक्षत्र में कृष्ण जन्माष्टमी 26 अगस्त को मनेगी। कृष्ण जन्माष्टमी की पूजन विधि क्या है, पूजन के लिए शुभ समय कौनसा है और उस दिन सुबह से लेकर रात्रि तक क्या-क्या करें और क्या न करें, ऐसे ही सवालों के जवाब अलीगढ़ के ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजन शर्मा ने ज्योतिषानुसार दिए।

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ज्योतिषाचार्य पंडित हृदय रंजन शर्मा ने बताया कि इस बार कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि का प्रारंभ 25 अगस्त की रात्रि 03:39 मिनट से हो रहा है। रोहिणी नक्षत्र जिसमें 16 कलाओं से युक्त भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था, वह 26 अगस्त को पड़ रहा । स्मार्तजन यानी घरेलू और निम्बार्क यानी भागवत, दोनों प्रकार के लोगों लिए 26 अगस्त को ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत, उपवास, पूजा-पाठ करने का सर्वोत्तम दिन माना जाएगा, क्योंकि उस दिन पूरी रात्रि में भी अष्टमी तिथि मान्य रहेगी। 

कृष्ण जन्माष्टमी व्रत ऐसे करें पूर्ण

पंडित हृदय रंजन शर्मा ने बताया कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत से एक दिन पहले सप्तमी को हल्का और सात्विक भोजन करें। रात्रि को स्त्री संग से वंचित रहें और सभी ओर से मन और इंद्रियों को काबू में रखें। व्रत वाले दिन सुबह स्नानादि से निवृत होकर देवताओं को नमस्कार करते हुए पूर्व या उत्तर दिशा में मुख करके बैठें। मध्याह्न में काले तिलों के जल से स्नान कर भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती देवकी और लक्ष्मी उनके चरण स्पर्श कर रहे हों या ऐसे भाव हों। उसके बाद विधि-विधान से पूजन करें।

कृष्ण जन्म का मुहूर्त

इस बार कृष्ण जन्म का मुहूर्त रात्रि में 11:47 से 12:30 के मध्य है। जन्म कराने के शुभ समय में रात्रि 12 बजे खीरे के अंदर लड्डूगोपाल की मूर्ति रखकर श्री कृष्ण का जन्म कराएं। जन्म के बाद बाल गोपाल को स्नान-वस्त्र आदि कराकर आरती करें और पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा, और लक्ष्मी का क्रमश: नाम जरूर लें। शंख में जल, फल, कुश, कुसुम और गन्ध डालकर दोनों घुटने जमीन में लगाएं और चन्द्रमा को अर्घ्य दें। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पिसे भुने हुए धनिये की पंजीरी का प्रसाद देकर भजन-कीर्तन, स्त्रोत आदि करें। दूसरे दिन पूर्वाह्न में स्नानादि करके व्रत का पारणा करें। इस व्रत में अनाज का उपयोग नहीं किया जाता। फलहार के रूप में कुट्टू के आटे की पकौड़ी, मावे की बर्फ़ी और सिंघाड़े के आटे का हलवा बनाया उपयोग किया जाता है।



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