
स्नेहधरा वृद्धाश्रम में मौजूद बुजुर्ग।
गौरी त्रिवेदी
लखनऊ। पितृ पक्ष में पितरों के पूजन और उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करने की परंपरा है। इस दौरान बहुत से लोग वृद्धाश्रम जाकर भी दान देते हैं, बुजुर्गों के साथ समय बिताते हैं और उनके साथ भोजन कर उनकी पसंद की चीजें उन्हें उपहार स्वरूप देते हैं। इसके लिए हर साल की तरह बाकायदा एडवांस बुकिंग भी शुरू हो गई है। …लेकिन दूसरी ओर वृद्धाश्रमों में बढ़ती बुजुर्गों की तादाद बताती है कि जीते जी उनका तिरस्कार उनके बच्चे ही कर रहे हैं।
अमर उजाला ने शहर के कई वृद्धाश्रमों में जाकर इस बाबत बात की तो न सिर्फ वहां रहने वाले बुजुर्गों ने बल्कि शेल्टर होम के संचालकों ने भी एक ही बात कही कि यहां आकर बुजुर्गों की सेवा करना पुण्य कार्य है। …लेकिन जीवित रहते अगर मां-बाप की सेवा उनके बच्चे करें तो उन्हें वृद्धाश्रम में आकर अपनी जिंदगी की शाम नहीं गुजारनी पड़ेगी। एक ओर जीवित माता-पिता का तिरस्कार और दूसरी ओर वृद्धाश्रम में दान के लिए कतार का विरोधाभास बताता है कि समाज में बुजुर्गों की उचित देखभाल कितनी जरूरी है।
दान की एडवांस बुकिंग, किसी ने लंच तो किसी ने डिनर का किया इंतजाम
स्नेहधरा वृद्धाश्रम से अमित सक्सेना ने बताया कि हर बार की तरह इस बार भी पितृपक्ष में दान की एडवांस बुकिंग शुरू हो गई है। सामान्य दिनों की अपेक्षा पितृ पक्ष में दान ज्यादा आता है। गेहूं, दाल, चावल, दलिया, फल, कपड़े आदि लोग दे जाते हैं। एडवांस बुकिंग में 21 सितंबर को किसी ने लंच तय किया है तो किसी ने 21 सितंबर का डिनर तय किया है।
यहां के बुजुर्ग हैं पेंशनर्स, नहीं लेते दान
छवि शांति धाम वृद्धाश्रम से अरविंद दीक्षित ने बताया कि इन पितृ पक्ष के दौरान दान ज्यादा आता है लेकिन उनके यहां के बुजुर्ग पितृ पक्ष में दान नहीं लेते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके यहां सभी बुजुर्ग पेंशनर्स हैं। इस वृद्धाश्रम में 30 प्रतिशत रहने वालों को देना होता है और बाकी का 70 फीसदी खर्च आश्रम वहन करता है।
मनपसंद चीज भी पूछकर दान करते हैं समाजसेवी
समर्पण सीनियर सिटीजन होम के मेजर वीके खरे ने बताया कि उनके यहां 43 बुजुर्ग रहते हैं। पितृ पक्ष में सामान्य दिनों की तुलना में लोग ज्यादा दान देते हैं। बुजुर्गों से पूछकर भी उनकी पसंद की चीजें दे जाते हैं। लेकिन मेरा मानना हैं कि माता-पिता की मनपसंद का जिंदा रहते सम्मान करें तो ज्यादा उचित रहेगा। अगर मां-बाप की जीवित रहते आप सेवा नहीं कर सकते तो उनकी मृत्यु के बाद कितना भी दान करते घूमें, उसका कोई औचित्य नहीं है।
