Lok Sabha Elections : Kurmi's flag bearer mother or daughter?...Elections will decide

अनुप्रिया पटेल और कृष्णा पटेल
– फोटो : facebook

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कुर्मी जाति की झंडाबरदार के तौर पर राजनीति करने वाले अपना दल के दोनों धड़ों की नेताओं (मां कृष्णा पटेल और बेटी अनुप्रिया पटेल) के लिए लोकसभा चुनाव कई मायने में चुनौतियों से भरा होगा। 2014 के बाद अलग-अलग होकर एक ही जाति की सियासत करने वाली मां-बेटी इस बार लगातार दूसरा चुनाव एक-दूसरे के खिलाफ लड़ेंगी। ऐसे में मां-बेटी सजातीय वोटों की कसौटी पर भी रहेंगी। हालांकि, दोनों दलों के लिए सीटें अभी भले ही तय नहीं हैं, लेकिन लोस चुनाव में मां-बेटी की समाज पर पकड़ की परख तो जरूर ही होगी।

सियासी पंडितों का मानना है कि पांच साल के दौरान अपना दल के राजनीतिक तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। इसलिए मां-बेटी के दलों में से किसी को कुछ फायदा होगा, तो किसी को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। वैसे भी डॉ. सोनेलाल पटेल ने जिन उद्देश्यों को लेकर अपना दल की स्थापना की थी, वे पार्टी के साथ दो भागों में बंट चुके हैं। लिहाजा बंटवारे के साथ दोनों दलों की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग हैं।

2019 में मां-बेटी की राहें हो गईं जुदा 

2014 के लोस चुनाव में अपना दल एक था, इसलिए कुर्मी समाज भी एकजुट था। 2019 से यह दो धड़ों में बंट गया। अपना दल (कमेरावादी) की कमान कृष्णा पटेल व बड़ी बेटी पल्लवी पटेल के, तो अपना दल (एस) की कमान दूसरी बेटी अनुप्रिया पटेल और दामाद आशीष पटेल के हाथों में है। 2019 के चुनाव में कृष्णा पटेल के नेतृत्व को कोई खास सफलता नहीं मिल पाई थी। अलबत्ता अपना दल (एस) ने मिर्जापुर और सोनभद्र सीट पर विजय हासिल की। कुर्मी बहुल कई सीटों पर वह भाजपा को जिताने में भी मददगार साबित हुआ था।

बीते पांच साल में अपना दल (कमेरावादी) ने सांगठनिक रूप से पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की है। पल्लवी पटेल सपा से विधायक भी बन चुकी हैं। माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में सजातीय वोटों को अपने पक्ष में करने को लेकर वह ताकत दिखाएंगी। हालांकि, पहले के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि कुर्मी समाज जहां भी रहा, एकजुट रहा। इस बार के चुनाव में अपना दल (कमेरावादी) के पीछे सपा खड़ी है, इसलिए माना जा रहा है कि मां-बेटी के नेतृत्व वाले दलों में कुर्मी वोटों के लिए जंग होना तय है।

जाति पर पकड़ का पैमाना भी होगा चुनाव

प्रदेश की करीब 14 सीटें ऐसी हैं, जहां पर कुर्मी मतदाताओं की संख्या 1.25 लाख से लेकर 3.75 लाख तक है।

  • इन सीटों पर कुर्मी मतदाता ही चुनाव परिणाम में निर्णायक भूमिका निभाता है। इन सीटों में मिर्जापुर, वाराणसी, फूलपुर, इलाहाबाद, बरेली, बांदा, डुमरियागंज, गोंडा, मछलीशहर, सुल्तानपुर, राॅबर्ट्सगंज, पीलीभीत, महराजगंज व प्रतापगढ़ शामिल हंै। माना जा रहा है कि इन सीटों पर मिलने वाले वोट  मां-बेटी की सजातीय मतदाताओं पर पकड़ का पैमाना भी बनेंगे।

7.64 % जनसंख्या है प्रदेश में कुर्मी समाज की राजनाथ सरकार की ओर से तैयार कराई गई सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट के मुताबिक 29 सीटों पर बनाते बिगाड़ते हैं समीकरण… प्रदेश की 80 में से करीब 29 सीटें ऐसी हैं जहां पर कुर्मी मतदाताओं की भारी तादाद है। 

अनुप्रिया के योगदान पर भी रहेगी समाज की नजर…

कुर्मी समाज का नेता होने के दावे तो दोनों खेमों के हैं। माना जा रहा है कि कुर्मी समाज की नजर कृष्णा पटेल से अधिक सत्ताधारी होने के नाते अनुप्रिया पटेल के योगदानों पर होगी। कृष्णा पटेल तो समाज को यह बताकर सहानूभूति बटोरने का प्रयास करेंगी कि वह न तो सत्ता में थीं और न ही उनके पास कोई अधिकार ही था। 



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