धुरंधर फिल्म में पाकिस्तानी नेता जमील जमाली के किरदार को अपने अभिनय से जीवंत बनाने वाले राकेश बेदी का कहना है कि रंगमंच उनके खून में है। वे चाहे जितना भी व्यस्त क्यों न हों, महीने में एक बार तो जरूर नाट्य मंचन के लिए समय निकाल लेते हैं। बोले, यहां तक कि धुरंधर फिल्म साइन करते वक्त भी मैंने डायरेक्टर को बोल दिया था कि मुझे नाटक रिहर्सल और मंचन के लिए समय चाहिए होगा। मेरी इस शर्त को डायरेक्टर ने मान भी लिया था।

बीएनए के स्वर्ण जयंती नाट्य समारोह में अपने एकल नाटक ‘मसाज’ के मंचन के लिए लखनऊ आए राकेश बेदी ने अमर उजाला से खास बातचीत में कहा कि फिल्म या टीवी पर व्यस्तता के बावजूद उन्होंने 50 साल के कॅरिअर में कभी रंगमंच का साथ नहीं छोड़ा। बोले, थियेटर दर्शकों के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव का अवसर देता है। 

उन्होंने कहा कि 1976 में एफटीआईआई से स्नातक करने के बाद से शायद ही कोई ऐसा महीना बीता हो, जब मैंने रंगमंच पर कदम न रखा हो। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि लखनऊ आकर नाट्य मंचन करना हमेशा सुखद होता है क्योंकि यह कला, संस्कृति और साहित्य से समृद्ध शहर है। यह कवियों, लेखकों और गायकों का शहर है। यहां के दर्शकों से हमेशा बहुत प्यार मिला।

दस साल पहले आती ‘धुरंधर’ तो इतनी बड़ी हिट न होती

राकेश बेदी ने कहा कि धुरंधर या धुरंधर-2 अगर दस साल पहले रिलीज होती तो शायद बॉक्स ऑफिस पर इतनी बड़ी ब्लॉकबस्टर हिट न होतीं। बोले, दस साल पहले देश का माहौल दूसरा था और तब सोशल मीडिया भी इतनी बड़ी ताकत बनकर नहीं उभरा था।

अब तो सिनेमाहॉल से बाहर निकलते ही दर्शकों की जो प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर वायरल होती है, वह अपना असर दिखाती है। राकेश बेदी ने कहा, इसमें कोई शक नहीं है कि डायरेक्शन, तकनीक और अभिनय समेत हर दृष्टि से फिल्म बहुत ही लाजवाब बनी है।



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