देश-प्रदेश के विश्वविद्यालयों में शोध व अन्य कोर्स करने वाले छात्रों द्वारा हिंदी में तैयार करने वाले प्रस्तावों में होने वाली व्याकरण की कमियों को जल्द ही आसानी से दूर किया जा सकेगा। इसके लिए आईआईटी कानपुर जल्द ही एक एआई आधारित मॉडल लाएगा। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) में हाल ही में आयोजित दो दिवसीय एआई मंथन में आए आईआईटी कानपुर के प्रो. अर्नब भट्टाचार्या ने यह जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि अभी तक अंग्रेजी में व्याकरण की कमियों को दूर करने व जांचने के लिए ही टूल उपलब्ध है। आईआईटी जल्द ही हिंदी में व्याकरण जांचने के लिए वेब आधारित टूल लांच करेगा। इससे हिंदी में लिखी जाने वाली पीएचडी थीसिस आदि के लिए छात्रों को काफी मदद मिलेगी, क्योंकि यह देखने में आया है कि इंजीनियरिंग बैक ग्राउंड व अन्य छात्र भी हिंदी में व्याकरण की अपेक्षाकृत ज्यादा गलतियां करते हैं।
नकल या दोहराव जांचने के लिए भी विकसित होगा टूल
कार्यक्रम में छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक ने व्याकरण के साथ ही हिंदी में प्लैगरिज्म (नकल या दोहराव) को जांचने के लिए भी टूल लाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए कानपुर विश्वविद्यालय आईआईटी कानपुर का अपेक्षित सहयोग भी करेगा।
इस पर प्रो. भट्टाचार्या ने कहा कि वे प्लैगरिज्म जांच के लिए भी एआई आधारित टूल ला सकते हैं। हालांकि इसके लिए अपेक्षाकृत ज्यादा बजट व संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। उन्होंने कहा कि कानपुर विवि इसके लिए अपेक्षाकृत सहयोग करेगा तो आईआईटी कानपुर इसके लिए भी एआई टूल विकसित करेगा। अभी सिर्फ अंग्रेजी में ही प्लैगरिज्म जांचने के लिए टूल उपलब्ध हैं।
एआई का खुद का डाटा और मॉडल देंगे
आईआईटी कानपुर भारतजेन एआई ईको सिस्टम बनाने पर काम कर रहा है। एआई के क्षेत्र में अभी तक अधिकतर चीजें दूसरे देशों की प्रयोग में लाई जा रही हैं। प्रो. भट्टाचार्या ने कहा कि एआई के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की जरूरत है। इस दिशा में सोवरजेन एआई मॉडल की आवश्यकता है, जो न केवल खुद का डेटा, भाषा और संस्कृति पर आधारित हो।
देश के एक दर्जन आईआईटी, ट्रिपलआईटी व आईआईएम मिलकर भारतजेन एआई ईको सिस्टम पर काम कर रहे हैं। इसमें हम एआई का अपना खुद का डाटा, खुद का मॉडल, खुद की चैट जीपीटी व जेमिनी देंगे। भारतीय भाषाओं की एकता पर समन्वय प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है, क्योंकि भारतीय भाषाएं एक-दूसरे के काफी करीब हैं। हमारा उद्देश्य भारत को इस क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनाना है।
