विश्व अंगदान दिवस पर पीजीआई में वॉकाथन और जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन

लखनऊ। इस जन्म में अंगदान कर देंगे तो अगले जन्म में वह अंग दानदाता के पास नहीं होगा। अंगदान की राह में यही अंधविश्वास सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए हमें इस अंधविश्वास पर काबू पाना होगा। विश्व अंगदान दिवस पर एसजीपीजीआई में रविवार को विशेषज्ञों ने लोगों को अंगदान के लिए जागरूक किया।

एसजीपीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर नारायण प्रसाद एवं स्टेट ऑर्गन ट्रांसप्लांट सोसाइटी के संयुक्त निदेशक एवं अस्पताल प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रो. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि ब्रेनडेड होने के बावजूद करीब 20 फीसदी मृतकों के परिवारीजन अंधविश्वास की वजह से ही अंगदान नहीं करते हैं। लोगों को अच्छा जीवन देने के लिए हमें इन अंधविश्वासों पर विजय हासिल करनी होगी। इस मौके पर पूर्व ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर पुष्पा सिंह, विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर अमित गुप्ता को एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. आरके धीमन ने सम्मानित किया। जागरूकता कार्यक्रम में प्रो. अनुपमा कौल, प्रो. धर्मेंद्र भदौरिया, प्रो. रवि शंकर कुशवाहा, प्रो. मानस रंजन पटेल, मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर एवं ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर विजय सोनकर, वरिष्ठ सहायक संतोष वर्मा, वरिष्ठ तकनीकी अधिकारी महेश कुमार उपस्थित रहे।

अंगों की कमी के कारण नहीं हो पा रहा है ट्रांसप्लांट

प्रो. नारायण प्रसाद ने बताया कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग दो लाख मरीजों की लिवर फेल्योर या लिवर कैंसर से मृत्यु हो जाती है, जिनमें से लगभग 10-15 फीसदी को समय पर लिवर प्रत्यारोपण के जरिये बचाया जा सकता था। अंगदान न होने की वजह से जरूरी 25 हजार प्रत्यारोपण में से महज 1500 ही हो पाते हैं। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, 1995 के बाद से, केवल 2,546 लोगों ने ही अपनी मृत्यु के बाद अपने अंगों को दान करने का विकल्प चुना। जीवित रहते हुए 34,094 लोगों ने अपने अंगों को दान करने का विकल्प चुना।



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