लखनऊ। जी-20 शिखर सम्मेलन में एक तरफ भारतीय संस्कृति की धूम मची हुई है, तो ऐसी ही एक तस्वीर लखनऊ विश्वविद्यालय में भी दिख रही है। यहां आने वाले विदेशी विद्यार्थी प्राचीन भारतीय कला में खास रुचि ले रहे हैं। इस साल पहली बार एक के बाद एक 10 से ज्यादा विदेशी विद्यार्थियों ने शिल्पकला संकाय में दाखिला लिया है।
लविवि में साल दर साल विदेशी विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है। भारतीय सांस्कृतिक एवं संबंध परिषद के माध्यम से आने वाले इन विद्यार्थियों को सुपर न्यूमेरिक सीट पर दाखिला दिया जाता है। अभी तक विद्यार्थी यहां के परंपरागत पाठ्यक्रमों के साथ साहित्य और भाषा के विषयों में दाखिले ले रहे थे। इस साल विदेशी विद्यार्थियों ने शिल्पकला के विषयों में दाखिला लेना शुरू किया है। विदेशी विद्यार्थी इनमें पढ़ाई करके यहां की कला को समझना चाहते हैं।
लविवि का शिल्पकला महाविद्यालय देश के सबसे पुराने शिल्पकला महाविद्यालयों में से एक है। चित्रकला में दाखिला लेने वाले बांग्लादेश के विद्यार्थी दीप्तो रे जिनके पिता मशहूर चित्रकार रहे हैं, उनके अनुसार कला के हिसाब से भारत काफी संपन्न देश है। इसलिए वह यहां आकर प्राचीन कला को समझना चाहते थे। इसी तरह श्रीलंका से आए एनएच चंद्रा के अनुसार भारतीय कला और संस्कृति को लेकर उनके देश में काफी उत्सुकता है। इसी के तहत वो यहां पहुंचे हैं।
शिल्पकला महाविद्यालय की डिजाइन स्कूल के रूप में हुई थी शुरुआत
शिल्पकला महाविद्यालय के रूप में भले ही इसकी शुरुआत वर्ष 1911 में हुई हो, लेकिन इसका इतिहास इससे कहीं पुरानी है। असल में औद्योगिक डिजाइन स्कूल के रूप में 1 नवंबर 1892 को इसकी शुरुआत अमीनाबाद में हुई थी। इसे ही वर्ष 1911 में शिल्पकला महाविद्यालय का दर्जा मिला। नाथनियल हर्ड इसके पहले प्रिंसिपल थे। 1917 में स्कूल का नाम बदलकर गवर्नमेंट कॉलेज स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स कर दिया गया। 1925 में भारतीय चित्रकला विद्यालय को पाठ्यक्रम में लाया गया और 1963 में ग्राफिक कला पाठ्यक्रम शुरू किया गया। इस समय यह लविवि के संघटक कॉलेज के साथ ही फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स के रूप में काम कर रहा है।
प्राचीनता लुभा रही
लखनऊ के शिल्पकला महाविद्यालय में अभी प्राचीन भारत की मूर्तिकला, चित्रकारी आदि का पठन-पाठन होता है। वहीं, अन्य कला महाविद्यालयों ने आधुनिक कलाओं को अपने सिलेबस में शामिल किया है। शायद इसी से खिंचकर विदेशी विद्यार्थी यहां आ रहे हैं।
-डॉ. संजीव किशोर गौतम, विभागाध्यक्ष, फाइन आर्ट्स, शिल्पकला महाविद्यालय
