
UP RERA
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बिल्डरों के गलत प्रलोभन के झांसे में आए ग्राहकों की गाढ़ी रकम वापस कराने के लिए रेरा ( रियल इस्टेट विनियमन एवं विकास अधिनियम) का अभियान रंग लाया है। इसके तहत करीब 6000 लोगों ने 3000 करोड़ से ज्यादा रकम वापसी के लिए रेरा का दरवाजा खटखटाया था। रेरा ने 10 हजार से ज्यादा वसूली प्रमाण पत्र जारी किए। इसका असर ये हुआ कि अबतक 1430 करोड़ रुपये वापस कराए जा चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब ग्राहकों की डूबी रकम वापस मिली हो। हालांकि अभी भी 1570 करोड़ रुपये बिल्डरों के पास फंसे हुए हैं।
प्रॉपर्टी कंसल्टेंट फर्म एनारॉक की पिछले साल की रिपोर्ट के मुताबिक सात प्रमुख शहरों में करीब पांच लाख घर अटके हुए हैं। इनमें ग्राहकों के 4.5 लाख करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। यानी पैसा भरने के बाद भी समय पर घर नहीं मिल रहा है। कई मामलों में बिल्डर एडवांस में जमा पैसा वापस देने में भी आनाकानी करते हैं। प्रापर्टी बेचने वाले बड़े एजेंटों की संख्या लाखों में है। इनमें से तमाम बड़ी रीयल इस्टेट कंपनियों के साथ काम करते हैं। अवैध या बिना स्वीकृत परियोजनाओं में भी ग्राहकों को झांसा देकर निवेश करा देते हैं। मनमाना शुल्क वसूलते हैं। यूपी रेरा ने ऐसे पीड़ितों के लिए मदद के हाथ बढ़ाए हैं। बिल्डर की मनमानी से त्रस्त ग्राहकों को केवल आश्वासनों या हाथ पर हाथ रखकर बैठने की जरूरत नहीं है। रेरा अधिनियम खरीदार की फंसी रकम वापस दिलाने में असरदार है।
हालांकि इतनी सख्ती के बावजूद बड़ी संख्या में रीयल इस्टेट डेवलपर ग्राहकों का पैसा नहीं लौटा रहे हैं। इनकी संख्या सबसे ज्यादा नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, लखनऊ के अलावा प्रयागराज, कानपुर, आगरा आदि में है। इसी का नतीजा है कि दस हजार वसूली प्रमाण पत्र जारी करने के बावजूद 47 फीसदी रकम ही ग्राहकों को वापस हो सकी है। करीब 53 फीसदी रकम अभी भी अधूरी और अवैध आवासीय परियोजनाओं में फंसी हैं।
घर या फ्लैट की बुकिंग के नाम पर डेवलपर लोगों से बुकिंग अमाउंट ले लेते हैं। भुगतान होने के बाद भी तमाम बिल्डर संपत्ति का स्वामित्व देने में आनाकानी करते हैं। रजिस्ट्री में देरी करते हैं। परियोजनाएं अटकाए रहते हैं। ऐसे लोगों की मदद के लिए यूपी रेरा लगातार कार्यवाही कर रहा है। ऐसे मामलों की अलग से निगरानी की जा रही है। -संजय भूसरेड्डी, अध्यक्ष, यूपी रेरा
घर खरीदारों के हितों से समझौता नहीं : संजय भूसरेड्डी
यूपी रेरा के अध्यक्ष संजय भूसरेड्डी ने रीयल इस्टेट डेवलपरों से कहा है कि घर खरीदारों के हितों से समझौता नहीं किया जा सकता। डेवलपरों की मुश्किलों और चुनौतियों को दूर करने के लिए समिति का गठन किया गया। प्रदेश के बिल्डरों के साथ बैठक में रेरा अध्यक्ष ने ये बातें कहीं। बैठक में रेरा और प्रोमोटर्स संगठन द्वारा रेरा अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों, आदेशों और उनसे जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा हुई।
बैठक का उद्देश्य प्रोमोटर्स के कामकाज में नियमों के मुताबिक एकरूपता लाने, पिछले आदेशों जैसे रियल इस्टेट परियोजनाओं और आवंटियों के लिए कब्जा प्रमाण पत्र (आक्यूपेंसी सर्टिफिकेट), पूर्णता प्रमाणपत्र (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) की आवश्यकता, ऑफर ऑफ पजेशन का मॉडल प्रारूप, बैंक खातों का रख-रखाव, प्रोमोटर्स के नामांकन के लिए मानक प्रक्रिया, हिन्दी में पत्राचार, भूखंड के स्वामित्व और उसके भार-मुक्त से संबंधित दिशा-निर्देश, परियोजनाओं की तिमाही रिपोर्ट, विज्ञापन तथा प्रचार-प्रसार संबंधी दिशा-निर्देश, आवंटियों से समझौते से संबंधित मानक प्रक्रिया, प्रोमोटर्स की व्यवहारिक कठिनाई और उनपर विचार-विमर्श करके अधिनियम के प्राविधानों के अनुसार उपाय निकालना शामिल था।
रेरा अध्यक्ष और सचिव ने साफ कहा कि रियल एस्टेट सेक्टर के सबसे बड़े हितधारक घर खरीदार हैं और नियम उनके हितों की रक्षा से जुड़े हैं। प्रोमोटर्स से कहा गया कि कार्यालय आदेशों का मकसद प्राधिकरण और प्रोमोटर्स के बीच तालमेल बैठाना और उसका लाभ आवंटियों तक पहुंचाना है।
बैठक में रेरा सचिव प्रमोद कुमार उपाध्याय, प्रमुख सलाहकार अबरार अहमद, तकनीकी सलाहकार सुबोध राय, वित्त सलाहकार सुधांशु त्रिपाठी और क्रेडाई एनसीआर के अध्यक्ष मनोज गौर, क्रेडाई पश्चिमी यूपी के अध्यक्ष दिनेश गुप्ता, राकेश यादव आदि थे।
