
मालिनी अवस्थी।
लखनऊ। लखनऊ का गणेशगंज इलाका अपने आप में पूरे शहर की संस्कृति को समेटे हुए है। यहां मेरा ददिहाल हुआ करता था और मेरे ताउजी केकेसी कॉलेज में फिजिक्स पढ़ाते थे। ये बातें साझा करते हुए लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने शहर से अपने जुड़ाव और बचपन की यादों को ताजा किया। वह बृहस्पतिवार को श्री जय नारायण मिश्र केकेसी पीजी कॉलेज में आयोजित दूसरे लिटफेस्ट कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर बोल रही थीं।
मालिनी अवस्थी ने बताया कि अब किस्सा सुनने के लिए लोग किसी मंच कलाकार को खोजते हैं लेकिन पुराना लखनऊ वह स्थान है जहां हर घर में बुजुर्गों की जबान पर इस शहर के किस्से रटे हुए हैं। कहा कि लखनऊ के डीएनए में संगीत है। शादियों में गाई जाने वाली गारी एक अद्भुत लोकशैली है। लोगों की फरमाइश पर उन्होंने गारी की पंक्तियां कहीं गोरी से नैना लड़े होईहै…जेल खाने में समधी पड़े होइहैं… गाकर सुनाई। मंच पर महाविद्यालय के शिक्षक अंशुमाली शर्मा ने उनसे बात की।
लिटफेस्ट के दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष शुक्ल रहे। प्राचार्य प्रो. विनोद चंद्रा के साथ हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि लखनऊ की सबसे बड़ी पहचान यहां का बड़ा मंगल और मुहर्रम है जो इसे अन्य शहरों की संस्कृतियों से अलग बनाता है।
सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं…
तीसरे सत्र में प्रो. अनिल त्रिपाठी ने गजल गायक व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. हरिओम संग मंच साझा किया। डॉ. हरिओम ने गायकी के अपने शौक के बारे में बताते हुए कहा कि पहले मैं घर में ही गाता था। धीरे-धीरे मंचों पर आया। उन्होंने कहा कि हिंदी कविता को समझने के लिए इसके व्यापक स्वरूप को समझना जरूरी है। छात्र-छात्राओं के कहने पर उन्होंने अपनी गजल सिकंदर हूं मगर हारा हुआ हूं… गाकर सुनाई। संचालन प्रो. पायल गुप्ता ने किया। इस अवसर पर प्रबंधक जीसी शुक्ला, उप प्राचार्य प्रो. केके शुक्ला, डॉ. विजयराज श्रीवास्तव समेत छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
कॉलेज में हो लोककला की पढ़ाई
मुख्य अतिथि मालिनी अवस्थी ने मंच से ही महाविद्यालय प्रबंधन से अपील की कि कॉलेज में लोककला एवं लोकगीतों से संबंधित कोर्स शुरू करें जिससे इसकी शिक्षा छात्रों तक भी पहुंचे। इस पर कॉलेज के प्रबंधन ने अपनी स्वीकृति देते हुए सकारात्मक निर्णय लेने की बात कही।
