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Mahakumbh 2025 : महाकुंभ में श्रद्धालु – फोटो : मेला प्राधिकरण
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चपायल ह केहू, दबायल ह केहू/घंटन से उपर टंगायल ह केहू/केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पियर/केहू फनफनात हउवे कीरा के नियर/बप्पा रे बप्पा आ दईया रे दईया/ तनी हम्मे आगे बढ़े देता भईया/मगर केहू दर से टसकले ना टसके/टसकले ना टसके मसकले ना मसके…। मौनी अमावस्या स्नान पर्व पर संगम में मौन डुबकी के लिए उमड़े आस्था के जन सागर के बीच लोक बिंबों विख्यात कवि कैलाश गौतम की ”अमौसा क मेला” कविता की यह पंक्तियां बरबस उन दृश्यों को हूबहू चित्रित कर रही हैंं।
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सावन-भादों की बाढ़ में उफनाती नदियों की लहरें जैसे समुद्र में मिलने के लिए आतुर हों, उसी तरह मंगलवार की पौ फटने से पहले संगम जाने वाले हर मार्गों पर आस्था का जन सागर उफनाने लगा। दोपहर तक 1.10 करोड़ लोगों ने संगम में डुबकी लगाई। महाकुंभ के इस सबसे बड़े अमृत स्नान पर्व पर 10 करोड़ से अधिक संतों-भक्तों के डुबकी लगाने का अनुमान है। मौनी अमावस्या पर बुधादित्य योग के साथ सर्वसिद्धि योग में सूर्य के मकर और गुरु के बृषभ राशि में गोचर करने के साथ ही आधी रात संगम की अमृतमयी त्रिवेणी में मौन डुबकी आरंभ हो गई।
चाहे लाल मार्ग हो या काली मार्ग या त्रिवेणी मार्ग, हर तरफ सिर पर गठरी, कंधे पर झोला और हाथ में बोरा लिए आस्था की डगर पर लपकते श्रद्धालु नजर आने लगे। इंदौर से आई लक्ष्मी सरस्वती छिवकी रेलवे स्टेशन से पैदल 15 किमी चलकर रुकते-बैठते हुुए संगम पहुंचीं। वह कहती हैं कि चाहत सिर्फ संगम के जल के स्पर्श की है।