पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल के निजीकरण मामले में निविदा प्रपत्रों को विद्युत नियामक आयोग में भेजने को लेकर तरह- तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। विद्युत उपभोक्ता परिषद का दावा है कि पावर कार्पोरेशन को यह अधिकार ही नहीं है कि वह आयोग को निविदा प्रपत्र भेजे। ऐसे में राज्य सरकार विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 86(2) उप धारा 4 के तहत आयोग को प्रकरण भेज सकती है।
मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह की अध्यक्षता में हुई एनर्जी टास्क फोर्स की बैठक में पावर कार्पोरेशन को निर्देश दिया गया कि पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल के निजीकरण से जुड़े निविदा प्रपत्र को नियामक आयोग को भेजकर अभिमत लिया जाए। इस निर्देश के बाद पावर कार्पोरेशन प्रबंधन इस बात को लेकर पशोपेश में रहा कि किस धारा के तहत नियामक आयोग को पपत्र भेजे जाएं। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद का दावा है कि अब गुपचुप तरीके से निर्णय बदला जा रहा है। कार्पोरेशन के बजाय अब प्रदेश सरकार विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 86 (2) उप धारा 4 में नियामक आयोग को पूरा मामला भेजेगी।
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा निजीकरण की प्रक्रिया शुरू करने से पहले ही नियामक आयोग से अनुमति लेनी चाहिए थी। लेकिन कार्पोरेशन प्रबंधन ने ऐसा नहीं किया। जबकि परिषद लगातार इसकी मांग करता रहा है। उन्होंने कहा कि कार्पोरेशन की ओर से ट्रांजेक्शन एडवाइजर (टीए) की नियुक्ति भी असंवैधानिक तरीके से की गई है। टीए कंपनी झूठे शपथ पत्र के मामले में दोषी है। उस पर अमेरिका रेगुलेटर द्वारा 40 हजार डालर का जुर्माना लग चुका है। ऐसे में इस कंपनी को नियुक्त करने वालों पर कभी न कभी कार्रवाई होना तय है।
नियामक आयोग अध्यक्ष व सदस्य नहीं दे सकते अभिमत- दुबे
विद्युत कर्मचारी संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने कहा कि एनर्जी टास्क फोर्स ने जिस ट्रांजेक्शन एडवाइजर कंपनी ग्रांट थार्नटन द्वारा तैयार किए गए निविदा प्रपत्रों को नियामक आयोग में भेजने का निर्देश दिया है। वह कंपनी ही झूठ की बुनियाद पर है। ऐसे में अवैध ढंग से नियुक्त की गई और झूठा शपथ पत्र देने वाली कंपनी के निविदा प्रपत्रों को नियामक आयोग को स्वीकार ही नहीं करना चाहिए। क्योंकि नियामक आयोग संवैधानिक संस्था है। खास बात यह है कि विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष अरविंद कुमार भी पावर कार्पोरेशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। अपने कार्यकाल में उन्होंने छह अक्तूबर 2020 को विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के समझौता किया था।
इस समझौता में तत्कालीन वित्त मंत्री सुरेश खन्ना एवं तत्कालीन ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा की उपस्थिति थे। लिखित समझौते में तय हुआ था कि पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का प्रस्ताव वापस लिया जाता है। कर्मचारियों एवं अभियंताओं को विश्वास में लिए बिना उत्तर प्रदेश में किसी भी स्थान पर कोई निजीकरण नहीं किया जाएगा। ऐसे में वह अभिमत नहीं दे सकते हैं। इसी तरह नियामक आयोग के सदस्य संजय सिंह भी कार्पोरेशन के कार्मिक रह चुके हैं। वे भी निजीकरण के प्रपत्रों पर अभिमत नहीं दे सकते हैं। विद्युत नियामक आयोग में कोई मेंबर लॉ नहीं है और आयोग का कोरम ही पूरा नहीं है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए विद्युत नियामक आयोग को निजीकरण के किसी भी प्रपत्र पर कोई मंजूरी नहीं देनी चाहिए।
आज बनेगी उग्र आंदोलन शुरू करने की रणनीति
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति की कोर कमेटी की 19 मई को बैठक होगी, जिसमें निजीकरण के विरोध में उग्र आंदोलन शुरू करने की रणनीति तैयार की जाएगी। सोमवार को भी वर्क टू रूल आंदोलन जारी रहेगा।