
अदालत का आदेश
– फोटो : istock
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कानून महिला केंद्रित जरूर है पर यौन अपराधों में हमेशा पुरुष ही दोषी नहीं होते। ऐसे संबंधों में महिलाओं की भी भागीदारी होती है, कभी कम कभी ज्यादा। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी व न्यायमूर्ति नंद प्रभा शुक्ला की खंडपीठ ने दुष्कर्म मामले में ट्रायल कोर्ट से बरी हुए युवक की बेगुनाही पर अपनी मोहर लगा दी। साथ ही पीड़िता की ओर से ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया।
मामला प्रयागराज के कर्नलगंज थाना क्षेत्र का है। पीड़िता ने वर्ष 2019 में युवक पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने, मारपीट और अनुसूचित जाति के उत्पीड़न के आरोप में केस दर्ज कराया था। पुलिस ने विवेचना के बाद युवक के खिलाफ आरोप पत्र ट्रायल कोर्ट में दाखिल किया था।
ट्रायल कोर्ट ने युवक को सभी आरोपों से बरी कर दिया। केवल मारपीट का दोषी मानते हुए छह माह की कैद और एक हजार रुपये का दंडादेश सुनाया था। इसके खिलाफ पीड़िता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए युवक को दुष्कर्म के आरोप से दोषमुक्त करने वाले आदेश को बरकरार रखा। कहा कि यौन अपराधों से जुड़े कानून महिला केंद्रित जरूर हैं, लेकिन हमेशा पुरुष साथी गलत नहीं होता है।
