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यातायात, डीजे और फैक्टरी का शोर डेसिबल में मापा जा सकता है। गलतफहमी यह है कि भारी शोर बंद होने पर सब सामान्य हो जाता है, लेकिन वास्तविकता में व्यक्ति के पूरे जीवन काल में निर्धारित शोर सहने की सीमा होती है। इसके बाद वह बहरा हो सकता है।
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने शोर पर आधारित मॉडल तैयार किया गया है, जो यह बता सकता है कि कितने दिनों तक कितना शोर आपको बहरा बना सकता है।
स्टेटिकल एस्टीमेशन ऑफ न्वॉइज इंड्यूज्ड हियरिंग लॉस अमंग द ड्राइवर्स इन वन ऑफ द मोस्ट पॉल्युटेड सिटीज इन इंडिया, के नाम से यह अध्ययन प्रसिद्ध जर्नल नेचर में प्रकाशित हुआ है। यह मॉडल डॉ. मनीश कुमार मनार, डॉ. शिवेंद्र सिंह, डॉ. प्रशांत बाजपेयी, डॉ. वीरेंद्र वर्मा, डॉ. एस. प्रसाद शुक्ला, डॉ. नीरज कुमार सिंह और डॉ. मार्कंडेय ने तैयार किया है।
इसके माध्यम से व्यक्ति शोर में रहने की अवधि और उसके स्तर का आकलन कर यह पता कर सकता है कि वह कितने दिन सुरक्षित है। इसके बाद कितने दिन का शोर उसे बहरा बना देगा।
