संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। मौनी नृत्य में बुंदेली लोक संस्कृति की झलक मिलती है। दीपावली के बाद परवा और भैया दूज को इस नृत्य की अनोखी छटा पूरे अंचल में बिखरती है। आकर्षक परिधान में कलाकारों की टोलियां गांव-गांव में नृत्य कला का प्रदर्शन करती हैं। इसे बुंदेलखंडी भाषा में दिवारी नृत्य भी कहा जाता है।
ढोल-नगाड़े बजते ही पैरों में घुंघरू, कमर में पट्टा व हाथों में लाठियां संग इनका जोशीला अंदाज देखते ही बनता है। एक-दूसरे पर लाठी के तड़ातड़ वार से दिल दहल जाता है। हालांकि, लाठियों से किसी को तनिक भी चोट नहीं आती है।
दीपावली पर मौन व्रत रखकर इस नृत्य कला को किया जाता है। बुंदेलखंड अपने आप में बहुत से लोक नृत्य और लोक संगीतों को सजोए हुए है। इन्हीं लोक नृत्यों में से एक है मौनिया नृत्य। विशेष रूप से यह नृत्य दीपावली के दूसरे दिन किया जाता है।
इस नृत्य में पुरुष अपनी पारंपरिक लिबास पहनकर मोर के पंखों को लेकर एक घेरा बनाते हैं। बुंदेलखंड का सबसे प्राचीन नृत्य मौनिया, जिसे सेहरा और दीपावली नृत्य भी कहते हैं, गांव-गांव में किशोरों द्वारा घेरा बनाकर, मोर के पंखों को लेकर, बड़े ही मोहक अंदाज़ में किया जाता है।
इसको ईश्वर की आराधना भी माना जाता है। बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों के लोगों के मौन होकर इस नृत्य को करने से इस नृत्य का नाम मौनिया नृत्य रखा गया। साथ ही मौन रखकर व्रत करने वालों को मौनी बाबा भी कहा जाता है। मौन परमा के दिन के साथ इस नृत्य को बुंदेलखंड में दीपावली के समय करने की परंपरा है।
प्राचीन मान्यता के अनुसार जब श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे तब उनकी सारी गायें कहीं चली गईं। प्राणों से भी अधिक प्रिय अपनी गायों को गायब देख भगवान श्रीकृष्ण दुखी होकर मौन हो गए, जिसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे।
जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें ले आए, तब कहीं जाकर कृष्ण ने अपना मौन तोड़ा। तभी से श्रीकृष्ण के भक्त गांव-गांव मौन व्रत रख कर दीपावली के एक दिन बाद मौन परमा के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गांवों की परिक्रमा लगाते हैं और मंदिर-मंदिर जाकर भगवान श्रीकृष्णा के दर्शन करते हैं।
