अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह

Updated Sun, 29 Sep 2024 11:55 AM IST

भारतीय सिनेमा में संगीतकार अनिल विश्वास, मदन मोहन और गीतकार राजिंदर कृष्ण ने अमिट छाप छोड़ी है। 1940 से 1970 के बीच के इन संगीतकारों ने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। इनका कहना है कि आज के संगीत में नयापन सिर्फ नाम मात्र का है। मदन के संगीत में कविता को तवज्जो मिली। साथ ही गजल और शायरी का समावेश मिला।


Musician said - Now there is lack of newness in music, old songs left an indelible impression

संगीत कार्यक्रम में प्रस्तुति देने पहुंचे कलाकार पवन झा, राजेश दुग्गल, शिखा वोहरा, संगीता गुप्ता।
– फोटो : अमर उजाला।

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भारतीय सिनेमा के गीत-संगीत ने लोगों पर अमिट छाप छोड़ी है। यह भारतीय सिनेमा की ताकत है कि उसने परंपरागत गीत और संगीत को समाहित करते हुए लोगों को अपने रंग में रंगा है। फिल्म लोगों को भले ही याद न हो, लेकिन वो गीत गुनगुनाना नहीं भूलते हैं। प्रयागराज संगीत क्लब की ओर से एनसीजेडसीसी में रविवार को आयोजित होने वाले संगीत समारोह में हिस्सा लेने के लिए आए संगीतकारों ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में उक्त विचार रखे। उन्होंने कहा कि टैलेंट और कंटेंट में कमी न होने के बावजूद आज के दौर में नया संगीत काफी कम बन रहा है।

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भारतीय सिनेमा में संगीतकार अनिल विश्वास, मदन मोहन और गीतकार राजिंदर कृष्ण ने अमिट छाप छोड़ी है। 1940 से 1970 के बीच के इन संगीतकारों ने भारतीय सिनेमा को नई पहचान दिलाई। इनका कहना है कि आज के संगीत में नयापन सिर्फ नाम मात्र का है। मदन के संगीत में कविता को तवज्जो मिली। साथ ही गजल और शायरी का समावेश मिला।

आज उसी को रिक्रेयेट किया जा रहा है। झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में उन्हीं की रचना है, जो आज लोगों की जुबान पर है। फिल्म वीर जारा, अनुराग कश्यप की फिल्म साहब बीवी गैंगस्टर, लग जा गले के गाने में वही संगीत दिख रहा है। रामचंद्र ने राक एंड रोल, आना मेरी जान संडे के संडे आदि में हिंग्लिश का खूब प्रयोग किया।



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