Muzaffarnagar के चरथावल मोड़ स्थित सिद्ध पीठ श्री शनि धाम मंदिर में अन्नकूट पर्व (जिसे अन्नकूट, गोवर्धन पूजा के नाम से भी जाना जाता है) का आयोजन अत्यंत भव्यता और श्रद्धा के साथ किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधियों के साथ मनाए गए इस पावन पर्व में हजारों भक्तों ने शिरकत की। इस अवसर पर पूजा-पाठ और भंडारे के साथ भगवान शनि देव की विशेष पूजा अर्चना की गई। पूरे दिन भक्तों का तांता लगा रहा और हर कोई भगवान से आशीर्वाद प्राप्त करने में जुटा रहा।

अन्नकूट पर्व न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और समाज के अद्भुत मेल का प्रतीक भी है। यह पर्व भक्तों को एकजुट करने के साथ-साथ धार्मिक आस्था और सामाजिक सद्भाव को भी प्रकट करता है।

अन्नकूट पर्व का धार्मिक महत्व और इतिहास:

अन्नकूट पर्व को गोवर्धन पूजा के साथ भी जोड़ा जाता है। इस पर्व का आयोजन भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर इंद्र देवता के प्रकोप से ब्रजवासियों की रक्षा करने की कथा पर आधारित है। इसके अनुसार, भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र देव की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने की सलाह दी, जिससे नाराज होकर इंद्र ने भयंकर बारिश शुरू कर दी। तब भगवान कृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सभी को सुरक्षित रखा। इस घटना की स्मृति में हर वर्ष गोवर्धन पूजा के अगले दिन अन्नकूट पर्व मनाया जाता है।

इस दिन भक्तगण विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर भगवान को अर्पण करते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं। यह परंपरा न केवल भगवान की कृपा प्राप्त करने का साधन मानी जाती है, बल्कि यह लोगों को एकत्रित कर उनके बीच के आपसी प्रेम और सहयोग की भावना को भी मजबूत करती है।

शनि धाम मंदिर में अन्नकूट का विशेष आयोजन:

Muzaffarnagar  के शनि धाम मंदिर में अन्नकूट के इस पर्व का आयोजन विशेष रूप से धार्मिक विधियों और भक्तिभाव के साथ किया गया। प्रातः काल से ही संतों का पूजन कर भगवान शनि देव को भोग अर्पित किया गया। पंडित संतोष मिश्रा और सिद्ध पीठ के गुरु पंडित संजय कुमार के नेतृत्व में यह धार्मिक क्रियाकलाप संपन्न हुआ। मंदिर प्रांगण में भक्तों के स्वागत और व्यवस्था में प्रबंध समिति के अध्यक्ष ललित मोहन शर्मा, उपाध्यक्ष शरद कपूर, मुकेश चौहान, राजेश अरोड़ा, अमित गुप्ता और शैलेंद्र शर्मा ने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके साथ ही राकेश, कार्तिक, आशीष और सतीश काले ने भी भंडारे के दौरान प्रसाद वितरण में योगदान दिया।

मंदिर के चारों ओर आकर्षक सजावट की गई थी। फूलों की मालाओं और रंग-बिरंगी रोशनी से सजी सजावट ने मंदिर प्रांगण को एक नई आभा दी। भक्तों का आगमन सुबह से ही शुरू हो गया था और देर शाम तक मंदिर में आस्था का सागर उमड़ता रहा। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान शनि देव की पूजा कर आशीर्वाद प्राप्त किया और भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।

अन्नकूट का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व:

अन्नकूट पर्व का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर्व में आयोजित भंडारे के माध्यम से समाज में सभी वर्गों को एक साथ भोजन करने का अवसर मिलता है। चाहे कोई उच्च वर्ग का हो या निम्न वर्ग का, इस पर्व में सभी एकसाथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जो हमारे समाज में समानता और सहयोग का संदेश प्रसारित करता है।

इस तरह के आयोजनों से न केवल धार्मिकता और आस्था का पोषण होता है, बल्कि यह समाज में आपसी भाईचारे और मेलजोल को भी बढ़ावा देता है।

सत्संग भवन में अन्नकूट का विशेष आयोजन:

सत्संग भवन, जो कि शामली रोड पर स्थित है, में भी अन्नकूट पर्व को भव्य तरीके से मनाया गया। यहाँ सुबह 11 बजे से आयोजन की शुरुआत की गई। सत्संग भवन के सचिव श्यामलाल बंसल ने बताया कि इस अवसर पर भक्तों को भोग और प्रसाद वितरण में भवन के अध्यक्ष त्रिलोकचंद गुप्ता, कोषाध्यक्ष ताराचंद वर्मा, ट्रस्टी शिवकुमार सिंघल और अन्य सदस्यों ने सेवा की। इस पर्व के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एकत्र होकर इस धार्मिक कार्यक्रम में सहभागी बने।

धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का महत्व:

अन्नकूट जैसे पर्व समाज में एकता और सामुदायिकता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस तरह के धार्मिक आयोजन समाज को आस्था और सामाजिक एकता के धागे में पिरोते हैं। भक्तों का मंदिर में एकत्रित होना, भगवान का भोग बनाना और भक्तों में बांटना एक ऐसी परंपरा है जो हमें हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की याद दिलाती है।

अन्नकूट पर्व के माध्यम से जनसेवा और सामाजिक सहयोग का संदेश:

यह पर्व केवल पूजा-अर्चना का साधन नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से समाज सेवा और जन सहयोग का संदेश भी दिया जाता है। भक्तगण अपनी श्रद्धा और आस्था को भगवान के प्रति समर्पित करते हैं, वहीं मंदिर के कार्यकर्ता और समिति सदस्य जनसेवा में लगे रहते हैं।

मुजफ्फरनगर का यह अन्नकूट पर्व इस बात का प्रतीक है कि आज भी हमारी धार्मिक परंपराएँ समाज में एकता, सहयोग और समर्पण की भावना को जीवित रखती हैं। ऐसे आयोजन न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करते हैं बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनते हैं। अन्नकूट के इस भव्य आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि आस्था और सेवा का यह संगम समाज को एक नई दिशा देने में सक्षम है।



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