मुजफ्फरनगर।(Muzaffarnagar News) जल निगम कार्यालय में बुधवार दोपहर ऐसा हंगामा हुआ कि पूरे विभाग में हड़कंप मच गया। ठेकेदारों ने लंबित भुगतान को लेकर जमकर प्रदर्शन किया, और इस बीच ठेकेदार बिंदर ने आत्मदाह का प्रयास कर दिया। यह घटना अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं थी।
ठेकेदारों का आरोप: भुगतान में देरी से बढ़ रही समस्याएं
ठेकेदारों ने जल निगम और गाजियाबाद की एन.के.जी. कंपनी पर 16 महीनों से भुगतान रोकने का आरोप लगाया। ठेकेदार बिंदर, जिनका बकाया काफी समय से अटका हुआ है, ने कहा कि उनके परिवार को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। बिंदर ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया, “मेरी बेटी की शादी 6 दिसंबर को है। लगन 29 दिसंबर को जाना था। लेकिन भुगतान न मिलने की वजह से तैयारी अधूरी है।”
बिंदर के मुताबिक, उन्होंने कई बार अधिकारियों और संबंधित कंपनी से संपर्क किया, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन ही मिला। “आखिर में मजबूरी में मुझे आत्मदाह जैसा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा,” उन्होंने रोते हुए कहा।
आत्मदाह के प्रयास से बढ़ा तनाव
घटना उस समय और गंभीर हो गई जब ठेकेदार बिंदर ने आत्मदाह का प्रयास किया। गनीमत रही कि मौके पर मौजूद अन्य ठेकेदारों और कर्मचारियों ने तुरंत हस्तक्षेप कर उन्हें रोक लिया। इस बीच, कार्यालय के बाहर भारी संख्या में ठेकेदारों ने जमा होकर विरोध प्रदर्शन तेज कर दिया।
कंपनी ने कुछ भुगतान किया, लेकिन विवाद बरकरार
सूत्रों के मुताबिक, इस हंगामे की जानकारी मिलते ही एन.के.जी. कंपनी ने आंशिक भुगतान कर दिया। हालांकि, ठेकेदारों ने इसे “अपर्याप्त” बताते हुए प्रदर्शन जारी रखा। “यह हमारे साथ धोखा है। जब तक पूरा भुगतान नहीं किया जाएगा, हम विरोध करते रहेंगे,” एक अन्य ठेकेदार ने कहा।
एन.के.जी. कंपनी का पक्ष
एन.के.जी. कंपनी गाजियाबाद ने इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ भुगतान प्रक्रियागत कारणों से लंबित थे, लेकिन जल्द ही इसे सुलझा लिया जाएगा। कंपनी के प्रतिनिधि ने कहा, “हम ठेकेदारों के साथ हैं और उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता पर करेंगे।”
पृष्ठभूमि: भुगतान का मुद्दा क्यों उठा?
जल निगम और संबंधित ठेकेदारों के बीच भुगतान संबंधी विवाद नया नहीं है। कई ठेकेदारों ने पहले भी विभागीय अधिकारियों और कंपनियों पर समय पर भुगतान न करने का आरोप लगाया है। इस बार मामला इसलिए तूल पकड़ गया क्योंकि ठेकेदार बिंदर ने इसे व्यक्तिगत स्तर पर लिया और गंभीर कदम उठाने की कोशिश की।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
इस घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और जल निगम के अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं। ठेकेदारों का कहना है कि प्रशासन ने अगर समय रहते इस मुद्दे पर ध्यान दिया होता, तो ऐसी नौबत नहीं आती।
स्थानीय राजनीति का असर
इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों ने भी हस्तक्षेप शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों ने सरकार और जल निगम पर निशाना साधते हुए इसे प्रशासनिक विफलता करार दिया। “ठेकेदार अपनी मेहनत की कमाई के लिए दर-दर भटक रहे हैं, और सरकार मौन है,” एक स्थानीय नेता ने कहा।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
वित्तीय विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबित भुगतान की समस्या आम है, खासकर सार्वजनिक विभागों में। लेकिन इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है, जिनकी आजीविका इन परियोजनाओं से जुड़ी होती है। “यह जरूरी है कि विभागीय भुगतान प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज बनाया जाए, ताकि ऐसी घटनाएं न हों,” एक विशेषज्ञ ने कहा।
जनता का आक्रोश और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। लोगों ने प्रशासन और संबंधित कंपनी पर जमकर निशाना साधा। “अगर यह स्थिति जारी रही, तो ठेकेदारों का विश्वास पूरी तरह से खत्म हो जाएगा,” एक ट्विटर उपयोगकर्ता ने लिखा।
भविष्य में समाधान के लिए क्या कदम उठाने होंगे?
- भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता:
जल निगम और संबंधित कंपनियों को ठेकेदारों के भुगतान प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना होगा। - समय पर भुगतान:
परियोजनाओं में लगे ठेकेदारों का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना जरूरी है। - मध्यस्थता तंत्र:
विवादों को सुलझाने के लिए एक स्वतंत्र तंत्र बनाया जाना चाहिए। - स्थायी नीति:
ठेकेदारों के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से ठोस नीति लागू होनी चाहिए।
यह मामला ठेकेदारों और सरकारी संस्थानों के बीच के खट्टे-मीठे संबंधों को उजागर करता है। अगर समय रहते समाधान न किया गया, तो यह विरोध किसी बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।