Nandababa Award: For some, tradition, for some hobby, for others compulsion gave them the new sky, know their

नंदबाबा पुरस्कार से सम्मानित लोगों की कहानी।
– फोटो : अमर उजाला

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दुग्ध विकास विभाग की तरफ से गोकुल और नंदबाबा पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रदेश के 144 लाभार्थियों में सबकी अपनी अलग कहानी है। कोई युवा है तो कोई बुजुर्ग। लेकिन, उमर कभी आड़े नहीं आई। किसी ने अशिक्षा में, किसी ने मजबूरी में, किसी ने परंपरा से तो किसी ने शौकिया इस क्षेत्र में किस्मत आजमाई और आज वो फलक पर छा गए। हालांकि, दीगर बात ये कि इन सभी की कहानियां और जीवन के संघर्ष भले ही अलग अलग रहे हों, लेकिन सबका हासिल एक है। वह यह कि प्रदेश भर के दुग्ध उत्पादक किसानों व पशुपालकों से खचाखच भरे इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट के बीच प्रदेश के दुग्ध विकास एवं पशुपालन मंत्री धर्मपाल सिंह ने स्मृति चिन्ह व नकद पुरस्कार से सम्मानित किया।

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पिता की इच्छा और परिवार की परंपरा को आगे बढ़ा रहे वरुण

प्रदेश भर में सर्वाधिक 2.08 लाख लीटर दुग्ध उत्पादन करने वाले खीरी जिले के बेलवा मोती गांव के वरुण सिंह बताते हैं कि 2016 से यह सिलसिला शुरू हुआ था। पराग से 10 साल से जुड़े हैं। इस हिसाब से छठी बार गोकुल पुरस्कार मिला है। पेशे से इंजीनियर रहे वरुण सिंह बताते हैं कि परिवार में पशुपालन पहले से ही हो रहा था। 2016 में केंद्र सरकार की कामधेनु योजना के तहत 100 दुधारु पशु खरीदे थे। बताया कि उनके पिता मरहूम यशपाल चौधरी धौरहरा से विधायक व प्रदेश में पूर्व मंत्री रहे थे। उनकी मंशा थी कि गायों व अन्य दुधारू पशुओं को अपने से अलग न किया जाए। उसी परंपरा को वह आगे बढ़ा रहे हैं। 2016-17 में दुग्ध संघ को 97,730 लीटर दुग्ध आपूर्ति से शुरू हुआ ये सफर आज 200 गाय और भैंसों की बदौलत 2.08 लाख लीटर तक पहुंच गया है।

1983 से पराग से जुड़ा परिवार, पिता का सपना कर रहे पूरा

प्रदेश भर में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में दूसरा स्थान हासिल करने वाले मेरठ जिले के रुहासा गांव के रहने वाले हर्ष मित्तल बताते हैं कि सहकारी दुग्ध संघ पराग से उनके पिता जी 41 साल से जुड़े हुए हैं। पिता जी का मकसद था कि पशुपालन के क्षेत्र में आगे बढ़ा जाए और इसे नई बुलंदियों पर पहुंचाया जाए। इसी क्रम में पिता जी का सपना पूरा करने का प्रयास है। पहली बार गोकुल पुरस्कार मिला है। यह मेरठ क्षेत्र और परिवार के लिए गर्व की बात है। हमारे पास 60 गायें व 20 भैसें हैं, जिनसे 2022-23 में संघ को 51,680 लीटर दुग्ध की आपूर्ति की गई। भविष्य में और आगे जाना है।

महज 10वीं तक ही थी पढ़ाई, दुग्ध उत्पादन में ही बनाई ऊंचाई

प्रदेश में देसी नस्ल की गायों के लिए रिकॉर्ड उत्पादन के लिए नंद बाबा पुरस्कार से सम्मानित बाराबंकी के उधौली गांव निवासी लवलेश कुमार बताते हैं कि उनकी पढ़ाई सिर्फ दसवीं तक ही है। हाईस्कूल तक पढ़ने वाले को क्या नौकरी मिलती। इसीलिए पशुपालन और डेयरी उद्योग में आगे बढ़ने की कोशिश की। 2017 से देसी गायों के दूध में विकास के लिए नंदबाबा पुरस्कार शुरु हुआ था। इसकी जानकारी मिली तो राह और आसान हो गई। इस समय 18 गाये हैं, सिर्फ समिति को दूध बेचा। स्वरोजगार के लिए पशुपालन व डेयरी उद्योग काफी बेहतर विकल्प है। सरकार को जिला स्तर पर गोबर खरीदकर कंपोस्ट खात बनवाने का प्लांट लगवाना चाहिए।

परिवार की आर्थिकी बढ़ाने के लिए शुरू की डेयरी

जनपद स्तर पर नंदबाबा पुरस्कार से सम्मानित शाहजहांपुर की मंजीत कौर बताती हैं कि पति अकेले थे, बच्चे छोटे थे। एक की कमाई से काम नहीं चल रहा था तो 16 साल पहले पशुपालन का काम शुरू किया। चार साल पहले पति का निधन हो गया था। दो गायों से शुरु किया था, अब 18 गायें हैं। 50 हजार तक की मासिक कमाई हो जाती है।

नौकरी लग नहीं रही थी तो तलाशा स्वरोजगार

बुलंदशहर जनपद में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन करने वाले किसोला गांव निवासी सचिन बताते हैं कि 2018 से चार गायों से काम शुरू किया था। बीए पास करने के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे थे, लेकिन नौकरी नहीं लग पाई। 2018 से ये काम शुरू किया। इसके बाद भैंस लाए। इस वक्त 60 पशु हैं। मासिक कमाई 30-35 हजार रुपये हो जाती है।

 



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