संवाद न्यूज एजेंसी
बिरधा (ललितपुर)। ब्लॉक बिरधा अंतर्गत ग्राम टीला में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन कथा व्यास ने भगवान श्रीकृष्ण और भक्त सुदामा का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि भक्त सुदामा की भक्ति की पराकाष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान तीन मुट्ठी चावल के बदले उन्हें तीनों लोक दान में देने जा रहे थे, लेकिन रुक्मिणी ने रोक लिया।
कथा व्यास चंद्रभूषण पाठक ने कहा कि भक्त सुदामा के पास सुबह और शाम भोजन की व्यवस्था नहीं रहती थी, लेकिन भक्त सुदामा ने भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति नहीं छोड़ी। सुदामा और श्रीकृष्ण बचपन के मित्र थे। भगवान द्वारिकाधीश ने समुद्र के अंदर सुंदर सी द्वारकापुरी नगरी की स्थापना की, जिसमें द्वारिकाधीश और तीनों रानियां बड़े ही प्रेम से रहती थीं। उसी क्षण सुदामा ठाकुरजी से मिलने के लिए द्वारकापुरी जाते हैं और चार मुट्ठी चावल लेकर ठाकुरजी को समर्पित करते हैं। गरीब सुदामा की गरीबी और भक्ति देखकर भगवान के नेत्रों से आंसू आ गए और सुदामा को अपना सब कुछ अर्पण कर दिया।
पहली मुट्ठी चावल में पृथ्वी लोक, दूसरी में स्वर्ग लोक और जब तीसरी मुट्ठी मे बैकुंठ लोक दान करने लगे, तब रुक्मिणी ने रोक लिया। कहा, प्रभु आप बैकुंठ लोक भी दान कर देंगे, तब हमारे पास क्या बचेगा। भगवान ने कहा कि देवी जब मेरे भक्त के पास एक चावल का दाना था, उसने मुझे पूरा चावल अर्पण कर दिया था। उसके पास कुछ भी खाने के लिए नहीं बचा था। जब हम अपना सब कुछ अपने भक्त को दान कर दें, तभी तो हमारा हिसाब बराबर होगा। तत्पश्चात सुदामा का गरीब परिवार आनंद मंगल से रहने लगा।
