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संगोष्ठी में मौजूद अरविंद पांडेय, बृजेश पांडेय, प्रो. अरविंद मोहन, अखिल भारतीय इतिहास संकलन योज



लखनऊ। प्रवासी भारतीय दिवस और विश्व हिंदी दिवस के माैके पर लविवि के हिंदी व आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, वाराणसी के ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल और भारत सेवा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘हिंदी का प्रवासी: प्रवासी की हिंदी’ का आयोजन किया गया। अध्यक्षता कुलपति प्रो. मनुका खन्ना ने की। मुख्य अतिथि अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि गिरमिटिया समाज का इतिहास कर्म, कौशल और संघर्ष का इतिहास है। गिरमिटिया समुदाय को मजदूर नहीं, बल्कि कर्मशील और कुशल कृषक बताते हुए कहा कि प्रवासी भारतीय विश्वबंधुत्व के सजीव मिसाल हैं। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने प्रवास के ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित किया। प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने कहा कि प्रवासी भारतीय भारतीय संस्कृति के ध्वज वाहक हैं। प्रवासी लेखन ने हिंदी साहित्य को नए विमर्श दिए हैं और प्रवासी व अप्रवासी के बीच संवाद बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने काशीनाथ सिंह, उषा प्रियंवदा और प्रभा खेतान सहित कई रचनाकारों के साहित्यिक योगदान का उल्लेख किया। कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. अरविंद मोहन ने प्रवासी अध्ययन केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव रखा।ग्लोबल गिरमिटिया काउंसिल के अध्यक्ष अरविंद पांडेय ने प्रवासी साहित्य पर संगठित शोध की आवश्यकता जताई। अमेरिका से लविवि आईं ग्लोबल हिंदी ज्योति की अध्यक्ष डॉ. अनीता कपूर और नीदरलैंड से जुड़े शारदानंद हरिनंदन ने भी गिरमिटिया विमर्श पर अपनी बात रखी।

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