
राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा
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रामजन्मभूमि परिसर में संचालित प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के क्रम में शुक्रवार से अचल विग्रह यानि मूर्ति की देह का शुद्धीकरण कर उनमें मंत्रों से प्राण डालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शुक्रवार को शुभ मुहूर्त में ठीक नौ बजे अरणि मंथन से तीसरे दिन के कर्मकांड शुरू हुए। पूजन के क्रम में नवग्रहों का पूजन, व मंदिर की वास्तु पूजा की गई।
काशी के आचार्य अरुण दीक्षित के आचार्यत्व में यजमान डॉ़ अनिल मिश्र ने अरणि मंथन की प्रक्रिया शुरू की। अरणि मंथन के दौरान लगातार अग्नि मंत्र गूंजते रहे। अरणि मंथन से पहले गणपति भगवान की पूजा हुई। फिर जलाधिवास में विराजे रामलला को जगाया गया। द्वारपालों ने सभी शाखाओं का वेदपारायण किया। अरणिमंथन से प्रगट हुई अग्नि की कुंड में विधिविधान पूर्वक स्थापना की गई। फिर नवग्रह देवताओं का पूजन हुआ। भूमंडल पर नौ ग्रह बैठे हैं। प्रकृति रूप में इनका पूजन होता है। हवन कुंड में सबसे पहले नौ ग्रहों का पूजन-हवन कर उनका आह्वान किया गया कि आप अनुष्ठान में पधारिये और सकुशल महायज्ञ को संपन्न कराइये। पूजन के क्रम में राममंदिर का वास्तुपूजन किया गया। यह प्रक्रिया करीब 40 मिनट तक चली। रामलला को औषधि, केसर व घी में अधिवास कराया गया है यह अधिवास शनिवार को समाप्त होगा।
यज्ञ में अग्नि प्रकट करने की वैदिक पद्धति है अरिण मंथन
काशी के आचार्य केशव शास्त्री ने बताया कि यज्ञ के द्वारा ही ईश्वर की उपासना करते हैं। यज्ञ में आहुति के लिए अग्नि की आवश्यकता होती है। अरणि मंथन में अग्नि मंत्र का उच्चारण करते हुए अग्नि प्रकट की जाती है, फिर वैश्विक कल्याण के लिए उसी अग्नि में हवन किया जाता है। अग्नि व्यापक है लेकिन यज्ञ के निमित्त उसे प्रकट करने के लिए भारत में वैदिक पद्धति है जिसे अरणि मंथन कहते हैं। आधुनिक युग में माचिस से लेकर गैस लाइटर होने के बाद भी यज्ञ शुभारंभ के लिए शास्त्रों में बताई गई सदियों पुरानी पद्धति से ही अग्नि को उत्पन्न किया जाता है।
योद्धा स्वरूप में है रामलला का रजत विग्रह
प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के लिए रामलला के एक रजत विग्रह का निर्माण भी कराया गया है। दस किलो वजन के इस विग्रह में रामलला धनुष-बाण धारण किए हुए है। पूजन की कुछ विधि ऐसी हैं जिन्हें अचल विग्रह के साथ नहीं पूरा किया जा सकता, क्योंकि अचल विग्रह भारी है, उसे बार-बार हिलाया नहीं जा सकता। इसलिए पूजन की कुछ विधियां इसी रजत विग्रह के साथ पूरी की जा रही हैं। आचार्य केशव शास्त्री ने बताया कि रजत विग्रह योद्धा स्वरूप में है। राम-रावण युद्ध के दौरान भगवान राम ने जब रावण को मारने के लिए उसके नाभि पर अग्निबाण चलाया था तो उस समय भगवान का जो स्वरूप था, उसी स्वरूप में रजत विग्रह निर्मित है।
