
साकार हरि बाबा
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सूरजपाल भले ही मूलरूप से बहादुर नगर, पटियाली, एटा के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंने अपना कथित आध्यात्मिक सफर आगरा से ही शुरू किया था। 1990 के दशक में वह एसपीआर कार्यालय, आगरा में सिपाही थे। उनके साथ काम करने वाले पूर्व कर्मचारी ने बताया कि सूरजपाल अलग-अलग सत्संग में जाने लगे। एक दिन अपने वालंटियर बना लिए। इसके वाद सत्संग शुरू कर दिया। छोटे से बड़े पंडाल बनने लगे। गली-मोहल्ले के बाद गांव-गांव में अनुयायी बन गए। इनमें दलित वर्ग के लोगों की संख्या अधिक होती थी। कोई बीमारी से ठीक होने के लिए प्रार्थना करता तो कोई काम धंधे चलाने के लिए गुहार लगाता था। अनुयायी बढ़े तो सूरजपाल ने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। देखते ही देखते बाबा ने वंचितों के मसीहा के रूप में अपना स्थान बना लिया।
