भारतीय कला, शिल्प और संस्कृति का सतरंगी संगम ताज महोत्सव और शिल्पग्राम एक दूसरे की पहचान बन गए थे, लेकिन 34 साल के सफर के बाद ताज महोत्सव शिल्पग्राम की जगह फतेहाबाद रोड के टाटा मैदान पर पहुंच गया है। अमर उजाला आर्काइव के पन्नों में दर्ज है कि 1992 में शुरू हुए ताज महोत्सव ने महज 1 लाख रुपये के बजट से 5 करोड़ रुपये के भव्य आयोजन तक का फासला तय कर लिया है।

महोत्सव शुरू होने की कहानी बेहद दिलचस्प है। वर्ष 1992 में पहला ताज महोत्सव 18 से 27 फरवरी की जगह 1 से 7 मार्च तक आयोजित किया गया था। तब शिल्पग्राम की शहर से दूरी को देखते हुए जिला प्रशासन ने गोल्फ कोर्स, सरदार पटेल उद्यान और रामलीला मैदान जैसे विकल्पों पर विचार किया था, लेकिन शिल्पियों और पर्यटन संस्थाओं के कड़े विरोध के बाद शिल्पग्राम पर ही मुहर लगी। पहले ताज महोत्सव में बांस-बल्ली और फूस की करीब 100 स्टॉल सजाई गई थीं। शिल्पकारों की मांग पर स्टॉल बढ़ाकर 150 करने पड़े थे। अब महोत्सव में 500 से अधिक शिल्पी आते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम भी मुक्ताकाशीय मंच और सूरसदन से निकलकर सेल्फी पॉइंट और सदर समेत अन्य स्थलों तक पहुंच गए।

तब दो रुपये था टिकट का मूल्य

वर्ष 1992 में प्रवेश टिकट 2 रुपये का रखा गया। 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश निशुल्क था। तब विदेशी पर्यटकों के लिए 5 रुपये का टिकट लगाया गया था। उसके बाद विदेशियों का प्रवेश नि:शुल्क कर दिया गया। अब देसी सैलानियों के लिए 50 रुपये का टिकट है और केवल 3 साल तक के बच्चों को ही महोत्सव में निशुल्क प्रवेश दिया जाता है। महज दो साल में ही महोत्सव इतना लोकप्रिय हुआ कि हर दिन चार हजार सैलानी यहां आने लगे।

मीनाक्षी शेषाद्रि ने दी थी ओडिसी नृत्य की प्रस्तुति

1993 में दूसरे ताज महोत्सव में फिल्म अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्रि के शास्त्रीय नृत्य का कार्यक्रम सूरसदन में रखा गया। करीब दो घंटे की इस प्रस्तुति को देखने के लिए लोगों ने जबरदस्त उत्साह दिखाया था। ठसाठस भरे सूरसदन प्रेक्षागृह में भगवान विष्णु के अवतार के साथ महाभारत के प्रसंग और राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया था।

 



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