लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के डॉक्टरों ने गर्भ में ही मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी से संक्रमित हुए शिशु की जान बचाकर नया इतिहास रचा है। जन्म के बाद टीबी से पीड़ित बच्चे की मां की मौत हो गई थी। केजीएमयू के बाल रोग विभाग में यह बच्चा करीब एक साल भर्ती रहा। इस तरह का यह पहला मामला है जिसमें गर्भ में संक्रमित हुए शिशु की जान बचाने में सफलता हासिल हुई है।
बाल रोग विभाग की डॉ. सारिका गुप्ता ने बताया कि यह बच्चा फरवरी 2023 में केजीएमयू लाया गया था। बच्चे के घरवालों ने बताया कि उसकी मां भी एमडीआर टीबी से पीड़ित थी। निजी अस्पताल में प्रसव के बाद मां की मौत हो गई थी। बच्चा पेट में ही टीबी संक्रमित हो चुका था। जन्म के बाद उसको ऑक्सीजन और वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। गंभीर हालत में उसे केजीएमयू रेफर किया गया था।
राष्ट्रीय गाइडलाइन के मुताबिक एमडीआर टीबी का इलाज 18 महीने चलता है। पहले छह महीने तक इसे सात दवाएं दी गईं। इस दौरान बच्चे का वजन नहीं बढ़ रहा था और न ही उसे ऑक्सीजन सपोर्ट से हटाया जा पा रहा था। इस वजह से दिल्ली में डॉ. एसके काबरा और डॉ. वरिंदर सिंह के साथ ही केजीएयमू के डॉ. सूर्यकांत से बराबर संपर्क किया गया। इनके साथ ही बाल रोग विभाग की प्रो. माला कुमार और प्रो. एसएन सिंह ने भी बच्चे के इलाज के लिए बराबर प्रयास किया। इनकी कोशिशों की वजह से छह महीने बाद बच्चे की हालत में सुधार होना शुरू हुआ। इस साल जनवरी में बच्चे को डिस्चार्ज किया गया। अभी बच्चे का इलाज चल रहा है, लेकिन अब वह खतरे से बाहर है।
विशिष्ट केस के रूप में जर्नल में प्रकाशन के लिए भेजा गया
डॉ. सारिका गुप्ता ने बताया कि गर्भ में ही एमडीआर टीबी से पीड़ित बच्चे की जान बचने का यह पहला मामला है। इलाज की पद्धति के साथ ही इसे एक विशिष्ट केस के रूप में प्रकाशन के लिए जर्नल को भेजा गया है।
समझें क्या है एमडीआर टीबी
एमडीआर टीबी वह अवस्था होती है जब इससे पीड़ित व्यक्ति में दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो जाती है। इस स्थिति में उस पर टीबी की सामान्य दवाएं काम नहीं करती हैं। ऐसे में रोगी को विशिष्ट दवाओं के सहारे रखा जाता है।
गाइडलाइन में नई दवाएं शामिल करने की उठाई गई मांग
डॉ. सारिका गुप्ता ने बताया कि एमडीआर टीबी की गाइडलाइन में जो दवाएं हैं, वे बच्चे पर असर नहीं कर पा रही थीं। इतने छोटे बच्चे की नस में रोजाना दो इंजेक्शन लगाए जाते थे। मुंह से खाने वाली कुछ दवाएं हैं, लेकिन वे गाइडलाइन में शामिल नहीं हैं। इसलिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम से उन दवाओं का इस्तेमाल करने की मांग की गई, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। ऐसे में पुरानी दवाओं से ही इलाज किया गया।
नली से दिया जाता था आहार
बच्चे की हालत बेहद खराब होने की वजह से वह दूध नहीं पी पाता था। ऐसे में उसे नली के माध्यम से आहार दिया जाता था। थोड़ा बड़ा होने पर उसे कटोरी-चम्मच से दूध पिलाया गया। अब बच्चा स्वस्थ है और सामान्य तरीके से खाता-पीता है।
