The principle of 'no work, no pay' is not applicable to the suspension period of a jailed employee.

अदालत।
– फोटो : अमर उजाला

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में बंद कर्मचारी की निलंबन अवधि पर ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं होता। वह भी तब जब कर्मचारी आपराधिक मामले से बरी होकर सेवा में बहाल हो जाए और उसके खिलाफ विभागीय कार्यवाही भी शुरू न की गई हो। यह अहम फैसला न्यायमूर्ति अजीत कुमार की एकल पीठ ने याची अनिल सिंह की ओर से निलंबन अवधि के नियमित भुगतान से इन्कार करने वाले विभागीय आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। साथ ही सरकार को 30 दिन में याची के बकाये वेतन का भुगतान करने का आदेश दिया है।

याची फतेहपुर राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में लिपिक के पद पर कार्यरत था। वह एक आपराधिक मामले में अगस्त 2009 से जनवरी 2016 तक जेल में निरुद्ध था। इसके कारण उसे निलंबित कर दिया गया था। छह साल चले आपराधिक मुकदमे से वर्ष 2016 में उसे बरी कर दिया गया। जेल से वापस लौटने के बाद उसकी सेवाएं बहाल कर दी गईं।

सेवा बहाली के बाद उसने निलंबन अवधि के नियमित वेतन भुगतान की मांग की तो विभाग ने उसके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जेल में रहने के कारण बिताई गई निलंबन अवधि में उसने काम नहीं किया है। इसलिए उसे नियमित वेतन पाने का हक नहीं है। विभागीय आदेश के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।



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