थियेटर के नाम पर लोगों को कुछ भी परोसना गलत है। कलाकार वही है जो मंच पर अपने भाव से रस पैदा करे और सामने बैठे दर्शक मंत्रमुग्ध होकर उसका पान करें। अभिनेता केवल अभिनेता नहीं होता, वह एक बाजीगर की तरह होता है, जो मजमे को अपने जादू से बांध देता है। महान नाटककार पीटर ब्रुक भी कहते थे, डोंट एक्ट, प्ले मतलब अभिनय करने की कोशिश मत करो, खेलो। ये बातें आगरा पहुंचे भारतीय मूल के फ्रांसिसी नाटककार व अभिनेता असील रईस ने अमर उजाला से खास बातचीत में कहीं।
असील रईस पेरिस में संस्कृत और भारतीय भाषाओं में नाटकों का निर्देशन व मंचन करते हैं। साथ ही फ्रेंच सिनेमा में अभिनय भी करते हैं। उन्होंने मशहूर फ्रांसीसी लेखक मिशेल अजामा की किताब क्रूसेड का हिंदी में अनुवाद किया है। उसी के प्रकाशन के सिलसिले में वह इन दिनों भारत में हैं। पेश है उनसे बातचीत के प्रमुख अंश।
सवाल : आपका जन्म भारत में कहां हुआ। भारत से फ्रांस तक आपकी यात्रा कैसी रही?
जवाब : मैं मूलरूप से ठाणे (महाराष्ट्र) के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं। पिताजी का तबादला होने पर करीब दस साल चेन्नई में रहा। विवि की पढ़ाई के लिए वापस मुंबई आया। बीकाॅम की पढ़ाई करते समय मैंने दो-तीन नाटकों का निर्देशन किया। इसी बीच फ्रांस सरकार से स्काॅलरशिप मिल गई। यह मेरी खुशकिस्मती रही कि फ्रांस जाने से पहले मेरी मुलाकात जानी-मानी फ्रांसिसी नाटककार अरियान मुनिस्किन से हो गई। उन्होंने मुझे अपने थियेटर ग्रुप के साथ फ्रांस में काम करने की दावत दी। तब वह भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर एक नाटक तैयार कर रही थीं। मैंने तीन महीने उनके साथ काम किया जिसके बाद उन्होंने मुझे आगे भी साथ काम करने का माैका दिया। यह मेरे लिए एक उपलिब्ध से कम नहीं था। मैंने यहां जो कुछ सीखा उसे अपनी झोली में समेटकर फ्रांस ले गया और वहां जो सीखा, कोशिश यही रहती है कि यहां आकर अपने लोगों के साथ साझा करूं।