ओवरलोड वाहनों से अवैध वसूली का जिन्न बाहर आया तो परिवहन विभाग के अफसरों की करतूत खुलकर सामने आ गई। जिस तरह मामले का खुलासा हुआ उससे पता चला कि अवैध वसूली के जरिए प्रतिमाह करीब 2.5 करोड़ का वारा न्यारा होता था।
यूपी एसटीएफ की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर में बताया गया है कि 141 वाहनों से प्रतिमाह एक वाहन से 10 हजार रुपये की वसूली होती थी। ऐसे में रायबरेली और फतेहपुर जिले के अधिकारियों, कर्मचारियों की ओर से 14 लाख से ज्यादा रुपये सीधे तौर पर वसूले जाते थे। वहीं, दोनों जिलों के बीच ढाई हजार ओवरलोड वाहनों का संचालन होता है। इसे जोड़ा जाए तो ढाई हजार वाहनों में 10 हजार रुपये प्रति वाहन से कुल वसूली 25 करोड़ होती है।
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एसटीएफ की पूछताछ में आरोपी मोहित सिंह ने स्वीकार भी किया है कि वह दो साल से इस कार्य में लिप्त था। ऐसे में जाहिर है कि दोनों जिलों के अधिकारी व कर्मचारी इतने लंबे समय से ओवरलोड वाहनों से अवैध वसूली करते थे।
बताया जा रहा है कि अवैध वसूली की शिकायत काफी दिनों से उच्चाधिकारियों तक पहुंच रही थी। उच्चाधिकारियों के निर्देश पर अचानक एसटीएफ ने कार्रवाई की। इससे दोनों जिलों के अधिकारियों व कर्मचारियों को बचने का मौका नहीं मिल पाया। एसटीएफ की कार्रवाई के बाद स्थानीय पुलिस व अफसर भी हलाकान रहे। वह भी कुछ बताने में असमर्थता जताते नजर आए। रायबरेली और फतेहपुर जिलों की सीमा आपस में जुड़ी हैं। बांदा से मौरंग, गिट्टी लदे ओवरलोड वाहन पहले फतेहपुर और फिर रायबरेली तक पहुंचते हैं।
यही नहीं रायबरेली होते हुए मौरंग, गिट्टी लदे वाहन गोरखपुर, प्रयागराज तक जाते हैं। बड़े पैमाने पर वाहनों की आवाजाही की वजह से अवैध वसूली हो रही थी। विभागीय अधिकारियों से लेकर कर्मचारी व इस गिरोह से जुड़े लोग मालामाल हो रहे थे। गिरोह से जुड़े लोग अधिकारियों को व्हाट्सअप के जरिए ओवरलोड वाहनों की सूची भेजते थे। इससे वाहन आसानी से आते-जाते थे। हर महीने की एक से 10 तारीख के बीच गिरोह से जुड़े लोग भुगतान वसूलते थे और फिर रुपये को कर्मचारियों की मदद से अधिकारियों तक पहुंचाते थे।
