स्कूल अब शिक्षा के मंदिर नही व्यापार का केंद्र बनते जा रहे हैं। नए शैक्षणिक सत्र के आगाज के साथ ही अभिभावकों से लूट शुरू हो गई है। स्कूल की ओर से अधिकृत पुस्तक विक्रेता न केवल बाजार मूल्य से दोगुनी कीमत पर कॉपियां बेच रहे हैं, बल्कि स्टेशनरी के नाम पर भी खुली लूट मची है। इन पुस्तक विक्रेताओं के यहां नो डिस्काउंट की नीति का सख्ती से पालन किया जाता है। जबकि बाजार में वही कॉपियां और स्टेशनरी आधी कीमत पर 15 से 20 प्रतिशत डिस्काउंट के साथ आसानी से उपलब्ध हैं।
शहर के तमाम स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र की पढ़ाई शुरू हो चुकी है। इसी के साथ शुरू हो चुका है अभिभावकों के शोषण का खेल। तय दुकान से कॉपी, किताब, यूनिफॉर्म और यहां तक कि जूते खरीदने पड़ रहे हैं। पुस्तक विक्रेताओं के पास कक्षावार छात्र-छात्राओं की संख्या है, जिससे वह यह आसानी से पता लगा पाते हैं कि कक्षा के कितने विद्यार्थियों की खरीद अभी शेष है। अभिभावकों से पूरे सेट की कीमत वसूलने के बाद भी विक्रेता एक या दो किताबें शॉर्ट बताकर उन्हें बाद में क्लास में बंटवाने का आश्वासन दे रहे हैं।
