सब ठाठ पड़ा रह जावेगा, जब लाद चलेगा बंजारा। यह बंजारा खामोश हुआ तो अवाम के शायर की विरासत भी गुमनाम हो गई। ताजमहल के पास मलको गली के जिस बेर के पेड़ के नीचे जनकवि मियां नजीर ने यह नज्म लिखी, वहां अब उनकी मजार है। जनकवि मियां नजीर की मजार पर वर्ष 1930 से वसंत पंचमी पर मेला लगता था लेकिन दो साल से नजीर पार्क में वीराना छाया है।

दरबार नहीं, बल्कि आम जनता के कवि मियां नजीर की मजार पर अब बकरे बंधे हैं। टिनशेड के नीचे और लोहे की रेलिंग में कैद नजीर की मजार गंदगी से पटी पड़ी है। यहां झाड़ू तक नहीं लगी। मजार पर चादर भी नहीं है। दो फूल भी मयस्सर नहीं हो रहे हैं। वर्ष 1735 में आगरा की गलियों में रहे नजीर ने ककड़ी, वसंत, होली, दिवाली, भगवान कृष्ण, रीछ, बाजार समेत आम लोगों से जुड़ी चीजों, त्योहारों पर नज्म लिखी थीं।

 




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Banjara Falls Silent Neglect Shadows Poet Nazir Akbarabadi’s Shrine Vasant Panchami Fair Absent for Two Years

नजीर की मजार
– फोटो : अमर उजाला


ऐसे जनकवि की विरासत को सहेजा नहीं जा सका। पूर्व में बज्म-ए-नजीर संस्था यहां आयोजन करती थी लेकिन दो साल से वह भी दो फाड़ हुई तो यहां वीराना छा गया। आयोजन से जुड़े रहे साहित्यप्रेमी अरुण डंग कहते हैं कि नजीर की विरासत को सहेजना आम लोगों के साथ सरकार की भी जिम्मेदारी है। नगर निगम का सहयोग मिलता था, पर अब दो साल से बंद है। नजीर किसी धर्म से नहीं बंधे, वह आम लोगों की आवाज हैं। टूरिज्म गिल्ड ऑफ आगरा के राजीव सक्सेना कहते हैं कि विदेशी उनके बारे में पूछते हैं, पर अपना देश, अपने लोग उन्हें भुला चुके हैं।

 


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नजीर की मजार
– फोटो : अमर उजाला


दंगे के बाद शुरू किया गया वसंत पंचमी मेला

1830 में जनकवि मियां नजीर के निधन के बाद उनके जनाजे की चादर हिंदू भी ले गए थे। घर के पास ही उन्हें पेड़ों की छाया में दफनाकर मजार बनाई गई थी। इसके ठीक 100 साल बाद वर्ष 1930 में दंगे के बाद वसंत पंचमी मेला शुरू किया गया। दोनों समाज के लोगों ने मियां नजीर की मजार पर हर साल मेले का आयोजन कर एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। तब नगर महापालिका ने मेले का आयोजन शुरू कराया। मलको गली के साथ ही 1979 में आगरा क्लब में काफी बड़े स्तर पर वसंत पंचमी मेला लगाया गया, जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट की सवारी के साथ आतिशबाजी का मुकाबला किया गया था।

 


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नजीर की मजार
– फोटो : अमर उजाला


अमर उजाला के पन्नों में नजीर मेला

आजादी के बाद जनकवि मियां नजीर की मलको गली में मजार पर हर साल वसंत पंचमी पर मेला भव्य होता चला गया। केंद्रीय मंत्री, मेयर, कुलपति, राज्य सरकार के मंत्री इसमें हर साल हिस्सा लेने आते थे। आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, अमेरिका आदि देशाें से लोग यहां पहुंचते थे। अमर उजाला आकाईव के पन्नों में दर्ज है कि वर्ष 1991 में बाबरी मामले के बाद माहौल बिगड़ा तो सूरकुटी से नजीर की मजार तक सांस्कृतिक यात्रा निकाली गई, जिसमें पूरे शहर के लोगों ने हिस्सा लिया। इसे अवामी एकता दिवस का नाम दिया गया। इप्टा के राजेंद्र रघुवंशी, जितेंद्र रघुवंशी, मिर्जा शमीम बेग, मोहन लाल अरोड़ा, अरुण डंग आदि इससे जुड़े रहे। वर्ष 1991 में तत्कालीन श्रम कल्याण मंत्री रामजी लाल सुमन, 1996 में तत्कालीन मेयर बेबीरानी मौर्य ने वसंत पंचमी पर नजीर मेले का उद्घाटन किया था।

 


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अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी में वसंत पंचमी
– फोटो : अमर उजाला


मुगलों ने फूलों की ईद के रूप में मनाया वसंत

मुगलों की राजधानी रहे आगरा के किले में शहंशाहों ने वसंत पंचमी को उल्लास के साथ मनाया है। मुगल दरबारी और इतिहासकार अबुल फजल की आइन-ए-अकबरी में वसंत पंचमी पर मुगल बादशाह के पीले कपड़े पहनने, बागों में उत्सव मनाने और फूलों की ईद के रूप में बताया गया है। तब आगरा किला के अकबरी महल के साथ यमुना के घाटों और रामबाग पर मेलों का भी ब्योरा है। तुजुक-ए-जहांगीरी में बादशाह जहांगीर के काल में वसंत में खिलने वाले फूलों के अध्ययन और पेंटिंग के लिए चित्रकार उस्ताद मंसूर (नादिर-उल-असर) को नियुक्त किया गया। तब सरसों के पीले रंग और पक्षियों की पेंटिंग मुगलिया दौर की खासियत बयां करती हैं। पद्मश्री से सम्मानित पुरातत्वविद केके मुहम्मद के मुताबिक वसंत का स्वागत मुगल बादशाह शाही अंदाज में करते थे। किले के अंदर जश्न-ए-बहार का आयोजन होता था, जिसमें दरबारी भी पीले कपड़ों में आते थे। महल में केसरिया पुलाव बनता था और किले में पतंगें उड़ाई जाती थीं।

 




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