झारखंड के जामतारा की गलियों में वर्षों तक बेड़ियों में जकड़ी और इंसानी बेरहमी के बीच अपनी जिंदगी गुजारने वाली मादा स्लॉथ भालू को नई और सुरक्षित दुनिया मिल गई है। करीब 10-12 वर्ष की ग्रेसी को झारखंड वन विभाग ने ”नाचने वाले भालू” के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले अवैध व्यापार के चंगुल से मुक्त कराया है। बचाव के समय ग्रेसी जंजीरों और रस्सी से बुरी तरह जकड़ी हुई थी। आगरा के कीठम स्थित भालू संरक्षण केंद्र में वाइल्डलाइफ एसओएस की देखरेख में ग्रेसी की विशेष देखभाल की जा रही है।

ग्रेसी के साथ ऐसी क्रूरता हुई कि उसके सामने के नुकीले दांतों को बेरहमी से उखाड़ दिया गया, उसकी बाईं आंख की रोशनी जा चुकी है और नाक में पिरोई गई मोटी रस्सी उसके मांस को चीर रही थी, जिससे उसे खाने-पीने में भी असहनीय दर्द होता था। शरीर में घाव के साथ वह जोड़ों के दर्द और निमोनिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रही है। सबसे मार्मिक क्षण वह था जब केंद्र में आने के बाद वह डर की वजह से अपने पिछले पैरों पर खड़ी होकर गोल-गोल घूमने लगी। डॉक्टरों के अनुसार, यह कोई खेल नहीं बल्कि उस भयानक प्रशिक्षण का नतीजा था, जो वर्षों तक मारपीट और शारीरिक दंड के माध्यम से उसे दिया गया था।

वाइल्डलाइफ एसओएस की टीम ने सबसे पहले उसे चेहरे पर बंधी रस्सी से आजाद किया। अब ग्रेसी का इलाज गहन चिकित्सा और ममता के साथ किया जा रहा है। उसे दलिया, शहद, ताजा तरबूज और पपीता जैसा पौष्टिक आहार दिया जा रहा है, ताकि वह धीरे-धीरे अपनी खोई हुई ताकत वापस पा सके। डायरेक्टर कंजरवेशन प्रोजेक्ट्स, बैजूराज एम.वी. का कहना है कि देश में इस क्रूर प्रथा को काफी पहले खत्म कर दिया था, लेकिन ग्रेसी जैसे मामले याद दिलाते हैं कि वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और सतर्कता की आज भी जरूरी है। सीईओ कार्तिक सत्यनारायण कहते हैं कि वर्षों तक अपमान और दर्द सहने वाली ग्रेसी पहली बार बिना किसी डर के सुकून की नींद सो रही है। उसे वह सम्मान और देखभाल दी जा रही है, जिसकी वह हकदार थी, ताकि वह अपने बाकी के दिन एक गौरवपूर्ण जीवन के साथ बिता सके।

 



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