केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) के विजन डॉक्यूमेंट से पत्थरों पर जादू उकेरने की सदियों पुरानी फारसी कला पर संकट मंडरा रहा है। मार्बल पच्चीकारी उद्योग के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने प्रदूषण स्कोर 30 तय किया है, जबकि ताजमहल से 10 किमी. परिधि में प्रदूषण स्कोर 30 वाले उद्योग नहीं लग सकेंगे। ऐसे में शहर की ऐतिहासिक पहचान बन चुकी पच्चीकारी विलुप्त हो सकती है। हजारों परिवारों की आजीविका भी प्रभावित होगी।

ताज ट्रेपेजियम जोन (टीटीजेड) की विजन डॉक्यूमेंट रिपोर्ट सीईसी ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है। जानकारों का कहना है कि इस रिपोर्ट से आगरा के जूता और पच्चीकारी उद्योग पर बुरा असर पड़ेगा। आगरा की पच्चीकारी को जीआई टैग मिल चुका है यानी यह देशभर में सिर्फ आगरा की धरोहर है।

हस्तशिल्पी मुनव्वर खां ने बताया कि पच्चीकारी की शुरुआत मुख्य रूप से इटली (फ्लोरेंस) में हुई थी। वहां इसे पिएत्रा ड्यूरा कहा जाता था। इसका अर्थ है कठोर पत्थर। भारत में इस कला को मुगल बादशाहों ने लोकप्रिय बनाया। शुरुआत हुमायूं और अकबर के समय हुई। चरम पर शाहजहां के शासनकाल में पहुंची। आगरा में पच्चीकारी का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण ताजमहल है। ताजमहल की दीवारों पर संगमरमर को तराशकर उसमें कीमती पत्थर जैसे लैपिस लाजुली, मैलाकाइट, जैस्पर और कॉर्नेलियन भरे गए। यह कला आज भी दुनिया को अचंभित करती है।

एत्माद्दाैला का मकबरा जिसे बेबी ताज भी कहा जाता है, पहला ऐसा स्मारक है जिसमें व्यापक रूप से पच्चीकारी का उपयोग किया गया। यह कला अपनी बारीकी के लिए जानी जाती है। इसमें सबसे पहले संगमरमर पर डिजाइन बनाई जाती है। फिर छोटे-छोटे औजारों से पत्थर को खुरचकर खांचे बनाए जाते हैं। इन खांचों में ठीक उसी आकार के कीमती पत्थर फिट किए जाते हैं और उन्हें सरेश से चिपकाया जाता है। यह भारत और फारसी-यूरोपीय कला के मिलन का प्रतीक है। यूनेस्को और भारत सरकार इसे हस्तशिल्प की श्रेणी में एक अमूल्य विरासत मानते हैं।

आगरा के स्टोन इनले वर्क को जीआई टैग प्राप्त है, जो इसकी विशिष्टता और भौगोलिक पहचान को प्रमाणित करता है। इसके बावजूद पच्चीकारी पर संकट गहरा रहा है। पच्चीकारी का कारोबार आज एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है लेकिन यह कई चुनौतियों से भी जूझ रहा है। आगरा से पच्चीकारी के उत्पाद जैसे टेबल टॉप, कोस्टर, ज्वेलरी बॉक्स और सजावटी सामान अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों में बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते हैं।

इन चुनौतियों से पहले ही जूझ रहा कारोबार

कच्चे माल की लागत के कारण कीमती पत्थरों और उच्च गुणवत्ता वाले मकराना मार्बल की बढ़ती कीमतों ने लागत बढ़ा दी है।

सस्ते विकल्प मिलने से बाजार में सिंथेटिक पत्थरों और मशीनी काम ने हाथ से काम करने वाले असली कारीगरों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है।

कारीगरों के पलायन से नई पीढ़ी इस काम में कम रुचि ले रही है, क्योंकि इसमें बहुत अधिक समय और एकाग्रता की आवश्यकता होती है, जबकि मेहनताना कम है।

पच्चीकारी का हब है गोकुलपुरा

आगरा का गोकुलपुरा इलाका पच्चीकारी का सबसे बड़ा हब है। इसके अलावा फतेहाबाद रोड पर कई बड़े शोरूम इस कला को प्रदर्शित करते हैं। हस्तशिल्पी राजकुमार ने बताया कि संगमरमर की मूर्तियां, फूलदान, प्लेट्स, और डाइनिंग टेबल टॉप्स की काफी मांग है। पच्चीकारी कला को वैश्विक बाजार में टिके रहने के लिए आधुनिक डिजाइनिंग और सरकारी प्रोत्साहन की निरंतर आवश्यकता है। यह न केवल ओडीओपी योजना का हिस्सा है, बल्कि आगरा के गौरव का प्रतीक भी है।

 



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