हम वेदों को मानने वाले लोग हैं, डीएनए में वेद है। महर्षि दयानंद मूर्ति पूजा के विरोधी नहीं थे, वह पाखंड और अंधविश्वास का विरोध करते थे। उनका कहना था कि पुरुष नहीं पुरुषार्थ को पूजो, व्यक्ति नहीं व्यक्तित्व की उपासना करो। ये विचार योग गुरु स्वामी रामदेव ने शनिवार को कमला नगर के जनक पार्क में आयोजित आर्य महासम्मेलन में वर्चुअल माध्यम से व्यक्त किए।

योग गुरु ने कहा कि हमें अपने भीतर राम की मर्यादा और कृष्ण के योगतत्व को आत्मसात करना होगा। वाणी, विचार में आर्यत्व लाओ। जीवन में राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक स्पष्टता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हम ऋषियों और वीरांगनाओं की संतान हैं। हमारे भीतर कृष्णत्व, रामत्व और शिवत्व समाहित है। आर्य ने वैदिक मूल्यों को दुनिया के 200 देशों तक पहुंचाया है।

इसके शाम के सत्र में महर्षि दयानंद पर आधारित फिल्म दिखाई गई। राष्ट्र निर्माण पार्टी के अध्यक्ष ठाकुर विक्रम सिंह ने कहा कि वेद मानवता को समानता, सदाचार और कर्म प्रधान जीवन का संदेश देते हैं। आर्य समाज सदैव समाज सुधार, शिक्षा प्रसार और राष्ट्रहित के कार्यों में अग्रणी रहा है। महिला आचार्य पवित्रा ने कहा कि महर्षि दयानंद सरस्वती ने नारी शिक्षा को समाज सुधार का मूल आधार बताया था। नारी का सशक्तीकरण केवल नारों से नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, शिक्षा और संस्कारों से होता है।

स्वामी आर्यवेश ने कहा कि अष्टांग योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के माध्यम से आत्म-मुक्ति की ओर ले जाने का मार्ग है। इस दौरान आचार्य विष्णु मित्र वेदारथी, पंडित कुलदीप आर्य, आर्य अश्वनी, सीए मनोज खुराना, प्रदीप कुलश्रेष्ठ, वीरेंद्र कनवर, सुधीर अग्रवाल, उमेश पाठक, अनुज आर्य, विकास आर्य, ऋषि मोहन, नमिता शर्मा, विद्या गुप्ता आदि मौजूद रहे।

 



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