इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के संबंध में जिला मजिस्ट्रेट की ओर से जारी किया गया प्रमाणपत्र पासपोर्ट जारी करने के लिए जेंडर और पहचान का अंतिम और निर्णायक प्रमाण होगा। पासपोर्ट प्राधिकरण इस आधार पर न तो दोबारा मेडिकल परीक्षण की मांग कर सकता है और न ही जन्म प्रमाणपत्र में पहले बदलाव कराने की शर्त रख सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने खुश आर गोयल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

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याची का आरोप है कि जन्म महिला के रूप में हुआ था, लेकिन बाद में एहसास हुआ कि वह ट्रांसजेंडर हैं। तो ट्रांजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम,2019 के तहत सक्षम प्राधिकारी से संपर्क किया और औपचारिकताएं पूरी कर पहचान प्रमाणपत्र प्राप्त किया। बालिग होने के बाद जेंडर परिवर्तन सर्जरी कराकर स्वयं को पुरुष के रूप में स्थापित किया। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए जिला मजिस्ट्रेट से संशोधित पहचान पत्र एवं प्रमाणपत्र प्राप्त किया। जिसमें उनका जेंडर पुरुष दर्ज किया गया।



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