इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पारिवारिक विवादों के कारण किसी नाबालिग बच्चे के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता। पासपोर्ट जैसी बुनियादी सुविधा को केवल माता-पिता के आपसी मतभेद के कारण रोका जाना कानूनन गलत है। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने पासपोर्ट विभाग को निर्देश दिया कि जौनपुर निवासी दो वर्षीय बच्ची का पासपोर्ट सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद चार सप्ताह के भीतर जारी किया जाए। बच्ची की ओर से उसकी मां ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

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कोर्ट ने कहा कि जब आवेदन के साथ सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध हों और किसी प्रकार का कोई स्थगन या निरोधात्मक आदेश न हो, तब प्रशासन को आवेदन को लंबित रखने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में अनावश्यक देरी को मनमाना माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट प्राप्त करना और विदेश यात्रा करना संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसे पारिवारिक विवादों के चलते छीना नहीं जा सकता। 



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