बिजली निगमों को घाटे में बताकर जहां निजीकरण की तैयारी चल रही है, वहीं निगमों ने 1.30 करोड़ रुपये ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन की सदस्यता लेने और चंदा देने में खर्च कर दिए। इसकी जानकारी मिलने पर उपभोक्ता परिषद ने बुधवार को नियामक आयोग में याचिका दाखिल कर सीबीआई जांच कराने की मांग की है। संघर्ष समिति ने भी इस मामले को लेकर सीएम को पत्र भेजा है। हालांकि, इस मुद्दे पर अभी ऊर्जा विभाग का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी बोलने को तैयार नहीं है।
प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल निगमों के निजीकरण प्रस्ताव तैयार होने के बाद लखनऊ में तीन जून को हुई बैठक में ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोसिएशन का गठन हुआ था। इसमें सभी सरकारी और निजी क्षेत्र के करीब 39 डिस्कॉम शामिल हैं। इसके महासचिव पॉवर कॉर्पोरेशन के अध्यक्ष डॉ. आशीष कुमार गोयल हैं। एसोसिएशन के डायरेक्टर पूर्व आईएएस आलोक कुमार हैं। संगठन एसोसिएशन पर निजी घरानों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं।
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इसके विरोध में उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने बुधवार को विद्युत नियामक आयोग में लोक महत्व प्रस्ताव दाखिल करते हुए बिजली निगमों द्वारा किए गए भुगतान संबंधी दस्तावेज सौंपे। वर्मा ने सवाल उठाया है कि बिना आयोग की अनुमति के किसी निजी संस्था को घाटे में चल रहे निगमों ने इतना बड़ा भुगतान कैसे दिया? वर्मा ने नियामक आयोग से पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की है।
किसने कितना किया भुगतान
पॉवर कॉर्पोरेशन ने ऑल इंडिया डिस्कॉम एसोशिएशन की सदस्यता के लिए 10 लाख और 1.80 लाख जीएसटी दिया है। शुरुआती सहयोग के रूप में 10 लाख रुपये का अलग भुगतान किया। इस तरह पॉवर कॉर्पोरेशन ने डिस्कॉम एसोसिएशन को कुल 21.80 लाख का भुगतान 3 जून को किया। पॉवर कॉर्पोरेशन के निर्देश पर पूर्वांचल, दक्षिणांचल, पश्चिमांचल, मध्यांचल विद्युत वितरण निगम और केस्को ने डिस्कॉम एसोसिएशन को अलग-अलग 21.80 लाख दिए। इस तरह पॉवर कॉर्पोरेशन और विद्युत वितरण निगमों ने कुल मिलाकर 1.30 करोड़ का भुगतान डिस्कॉम एसोशिएशन को किया।
ये सवाल मांगते हैं जवाब
संगठनों ने यह भी सवाल उठाया है कि पॉवर कॉर्पोरेशन और विद्युत वितरण निगमों ने नियामक आयोग से भुगतान की अनुमति ली है या नहीं। यदि अनुमति नहीं ली है तो इस चंदे को खर्च में जोड़कर उपभोक्ताओं पर भार डालने का आधार क्या है? संघर्ष समिति ने कहा कि घाटे के नाम पर एक निजी संस्था को करोड़ों रुपये का चंदा देना और उसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर डालना कितना नैतिक है?