
माायवती कांग्रेस से हैं आशंकित।
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लोकसभा चुनाव में अपने कैडर वोट बैंक का नुकसान सहने वाली बहुजन समाज पाटी के लिए प्रदेश में कांग्रेस बड़ा खतरा बनती जा रही है। कांग्रेस ने बसपा नेताओं को अपने पाले में करने की रणनीति बनाई है, जिससे दलित वोट बैंक पर करीब चार दशक पुराना उसका वर्चस्व दोबारा स्थापित हो सके। कांग्रेस की इस रणनीति से बसपा यूपी में और कमजोर होगी, तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस का पलड़ा सपा पर भारी होता जाएगा।
बता दें कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने हाल ही में अपनी पार्टी के उन नेताओं को सख्त चेतावनी दी है कि वह आरक्षण के उप-वर्गीकरण और क्रीमीलेयर के मुद्दे पर कांग्रेस की विचारधार का समर्थन नहीं करे। ऐसा करने वालों को पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक मायावती की इस चेतावनी की वजह बसपा नेताओं में कांग्रेस के प्रति बढ़ता आकर्षण माना जा रहा है। लोकसभा में करारी शिकस्त के बाद पार्टी नेताओं को बसपा के दोबारा सियासत में आने की संभावना खत्म होती दिख रही है। यही वजह है कि वह अपने राजनीतिक सफर को जारी रखने के लिए कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। बीते दिनों बस्ती और चित्रकूट में बसपा नेताओं ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है, जो बसपा के लिए नुकसान का सबब बन गया।
आखिर किसने पाले में गया यह वोट
दरअसल, करीब चार दशक पूर्व प्रदेश के दलित वोट बैंक पर पूरी तरह से कांग्रेस का कब्जा था। बसपा के अस्तित्व में आने के बाद कांग्रेस की पकड़ दलित वोट बैंक पर कमजोर पड़ती गयी। यही वजह रही कि कांग्रेस की जगह बसपा का प्रभुत्व बढ़ता गया और उसने दलित वोट बैंक की बदौलत प्रदेश में 4 बार सरकार बनाई। हालिया लोकसभा चुनाव में दलित वोट बैंक को अपने पाले में करने का दावा सपा और कांग्रेस कर तो रहे हैं, लेकिन यह कितना वोट बैंक किसके पाले में गया, इसे लेकर असमंजस बरकरार है।
तो सपा पर बढ़ जाएगा दबाव
वहीं आगामी उपचुनाव में सीटों को बंटवारे को लेकर दोनों दलों में अभी सहमति नहीं बन सकी है। कांग्रेस अगर दलित नेताओं को अपने पाले में करने में सफल रही तो यह सपा के साथ सीटों के बंटवारे में कारगर साबित हो सकता है। साथ ही पार्टी को यूपी में अपना खोया हुआ जनाधार भी वापस दिलाने में मदद कर सकता है।
