इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हो तो दशकों की देरी के बाद उसे सजा देना न्याय को एक निरर्थक अनुष्ठान में बदलने जैसा है। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने 42 साल पुराने हत्या के मामले में 100 साल की आयु पूरी कर चुके बुजुर्ग को बरी कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने कहा कि न्याय मानवीय परिस्थितियों से अलग कोई अमूर्त वस्तु नहीं है। कानून इस वास्तविकता को अनदेखा नहीं कर सकता कि बढ़ती उम्र अपने साथ शारीरिक कमजोरी और निर्भरता लाती है।
सजा का उद्देश्य सुधार और समाज का हित होता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा लंबित मुकदमे में बिता चुका हो तो सजा का व्यावहारिक और नैतिक बल समाप्त हो जाता है।
कोर्ट ने यह भी माना कि दशकों तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि यह खुद में एक कठोर सजा बन जाती है। 40 वर्षों तक अनिश्चितता और सामाजिक कलंक का सामना करना अपने आप में एक दंड है।
