मुगल बादशाह शाहजहां का बड़ा बेटा और औरंगजेब का भाई दाराशिकोह दालमंडी के काजीपुरा कलां में रहता था। यहीं बारादरी थी और अदालत भी यहीं लगती थी, जिसे पुरानी अदालत के नाम से जाना जाता था। यहीं पास में फांसी घर भी था। कुछ साल पहले तक तो पुरानी अदालत का भवन था लेकिन अब उसका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और अब उसे जानने वाले भी कम लोग रह गए हैं। जहां पुरानी अदालत थी अब वहां नए-नए भवन बन गए हैं।

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पुरानी अदालत में रहने वाले 81 वर्षीय महमूद अशरफ बताते हैं कि इब्राहीम लोदी के दौर से पुरानी अदालत का भवन था। इसकी मरम्मत करवाकर यहां दाराशिकोह रहा करता था। यहीं उसने संस्कृत सीखी थी। संस्कृत पढ़ने वह औरंगाबाद जाया करता था। बाद में यहां अदालत लगने लगी जहां काजी और काजी-उल-अकदा (जज और मुख्य जज) बैठते थे। इसलिए इसे पुरानी अदालत कहते हैं। इसके बड़े-बड़े मुख्य द्वार थे, जिसे तोड़ दिया गया। मुख्य द्वार के आगे बाग हुआ करता था। अंग्रेजों ने बदलकर दूसरी अदालत बनवाई। काजी यानी जज के रहने के कारण इस क्षेत्र का नाम काजीपुरा पड़ा होगा बाद में इसे काजीपुरा कलां के नाम से जाना गया।

काजीपुरा कला के रहने वाले बिल्डर असकरी रजा सईद बताते हैं कि पास में ही फांसी घर भी था। पुरानी अदालत के समय के तीन द्वार खंडहर के रूप में अब भी यहां विद्यमान हैं। लाखौरी ईंट से बने इस द्वार को दाराशिकोह का बनवाया हुआ माना जाता है। आज उस स्थान पर तमाम दुकानें बन गईं। असकरी रजा कहते हैं कि इन द्वारों को संरक्षित किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया तो इतिहास और तत्कालीन समय की गवाही देने वाले ये द्वार भी समाप्त हो जाएंगे।



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