
lok sabha election 2024
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राजनीति के धुरंधर जनता की नब्ज टटोलते हैं। समीकरण समझने में वक्त देते हैं। जमते हैं…। जमते हैं…। निर्णय लेते हैं… और फिर जीत का आनंद लेते हैं। रायबरेली में सपा व कांग्रेस की जुगलबंदी कुछ यही कहानी कहती है। सपा ने लोकसभा का मोह त्यागकर यहां की विधानसभाओं में पैठ जमाई और निरंतर शानदार प्रदर्शन कर रही है। कुल मिलाकर कहें तो कांग्रेस को वॉकओवर देना सपा की मजबूरी नहीं बल्कि मास्टर स्ट्रोक रहा। पढ़ें विशेष रिपोर्ट…
इंदिरा गांधी ने रायबरेली को बनाया राजनीति की प्रयोगशाला
इंदिरा गांधी के समय से ही रायबरेली सीट राजनीति की अद्भुत प्रयोगशाला रही है। इंदिरा ने यहीं से ब्राह्मण, मुस्लिम व दलित (बीएमडी) फार्मूला की नींव रखी। यह प्रयोग सफल रहा और फिर देखते ही देखते पूरे देश में कांग्रेस को नई दिशा मिली। इसके बाद सपा ने यहां पिछड़ों को सहेजना शुरू किया तो बसपा भी अपने काडर वोटों को एकजुट करने में लगी रही।
- वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में जब पहली बार सोनिया गांधी मैदान में उतरी तो सपा भी मैदान में डट गई। यह वह दौर था जब सपा रायबरेली में अपनी जड़ों को मजबूत कर रही थी, लेकिन बसपा के कैडर वोट के कारण सपा को विधानसभा चुनावों में दिक्कत आ रही थी।
- यही कारण रहा कि 1993 से लेकर 2004 तक के विधानसभा चुनावों में सपा ने 1993 में डलमऊ, 1996 में सरेनी, 2002 में बछरावां, सलोन, सरेनी में जीत हासिल की, लेकिन 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सरेनी, सलोन, बछरावा, सतांव में जीत हासिल कर सपा के थिंक टैंक को दंग कर दिया।
