संवाद न्यूज एजेंसी

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झांसी। अपनों के होते हुए भी वृद्धाश्रम में जीवन बिता रहीं बुजुर्ग महिलाओं की आंखें हर साल रक्षाबंधन पर नम हो जाती हैं। बचपन से जिन भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर उम्रभर रक्षा का वादा लिया था, आज वह उनका हाल जानने भी नहीं आते। इन महिलाओं को सगे भाइयों द्वारा ठुकराए जाने का मलाल तो है लेकिन, अब उन्होंने यहां रह रहे वृद्ध पुरुषों और भगवान को अपना भाई बना लिया है।

सिद्धेश्वर नगर में एक घर है, जिसे दुनिया वृद्धाश्रम कहती है। इस घर में कुल 134 वृद्ध रहते हैं, जिनमें 68 महिलाएं और 66 पुरुष हैं। हर एक की कहानी मिलती-जुलती है। आश्रम में रहने वाले वृद्ध वैसे तो गम का बोझ सीने पर उठाए ही रहते हैं, लेकिन रक्षाबंधन के मौके पर भाई और बहनों की याद में यह बुजुर्ग छिपकर अपनों से दूरी का दर्द आंसू बहाकर हल्का कर लेते हैं। कुछ बुजुर्ग ऐसे भी हैं, जिन्होंने पत्थर दिल अपनों के लिए अब रोना छोड़ दिया है और यहां रह रहे सदस्यों से भाई और बहन का रिश्ता जोड़ लिया है। रक्षाबंधन पर बुजुर्ग महिलाएं इन भाइयों की कलाई पर राखी बांधकर त्योहार मनाती हैं। साथ ही कुछ महिलाओं ने जग के रक्षक भगवान राम को अपना भाई मान लिया है।

भाई के बिना पहला रक्षाबंधन

रक्षाबंधन के जिक्र पर आश्रम में रह रहीं दीपा कुमारी फफक कर रोने लगीं। उन्होंने बताया कि वह 50 साल से जिस भाई को राखी बांधती आ रही हैं, वही उन्हें भूल गया है। अब यहां बुजुर्ग भाई मिले हैं, इस साल उन्हें ही राखी बांधूगी।

आश्रम में रह रहीं फ्लोरंस की उम्र 70 वर्ष हो चुकी है। वह बताती हैं कि पिछले 60 साल से ऐसा कोई रक्षाबंधन नहीं है, जब भाई को राखी नहीं बांधी। बताया- जिस भाई ने रक्षा करने का वचन दिया था, वही उन्हें सड़क पर छोड़ गया। लेकिन, एक भाई के बदले अब यहां इतने सारे भाई मिल गए हैं।

कुष्ठ आश्रम में रह रहीं फूला देवी के भाई हैं, लेकिन उन्हें कभी यह महसूस नहीं हुआ क्योंकि रक्षाबंधन पर वह नहीं आते। अब उन्होंने भी आस छोड़ दी है। फूला देवी ने भगवान राम को ही अपना भाई बना लिया है।



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