यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में ‘साहब के घड़ी और चश्मे के चर्चे’ की कहानी। इसके अलावा ‘साहब के जाने की खुशी ही खुशी’ और ‘साहब नहीं कारिंदों को दिक्कत’ के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी…

साहब की घड़ी और चश्मे के चर्चे

सूबे के एक जिला कप्तान की शादी की चर्चाएं थम नहीं रहीं। अब साहब की आठ लाख की घड़ी और तीन लाख का चश्मा चर्चा में है। अफसर हों या कर्मचारी हर कोई यही कर रहा है कि साहब शौक से समझौता नहीं करते। जो चीज पसंद आ गई, वह आज नहीं तो कल साहब के पास होगी। कीमत मायने नहीं रखती। यही नहीं, करोड़ों की बरात गाड़ी की पश्चिम से लेकर पूर्वांचल तक आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

साहब के जाने की खुशी ही खुशी

प्रदेश में तकनीकी पढ़ाई वाले एक विभाग के बड़े साहब की हाल ही में नई जगह तैनाती हो गई है। लंबे समय तक विभाग में रहने के बाद भी मातहतों में साहब के जाने का दुख कम खुशी ज्यादा है। साहब के बारे में यह विभाग में आम चर्चा थी कि वे काम को सुलझाने की जगह रोके रखने में विश्वास करते थे। फाइलें तब तक पड़ी रहती थीं, जब तक उसकी आखिरी तारीख न आ जाए। वहीं, बैठकों में घंटों-घंटों बिना पानी, चाय के ज्ञान मिलता था वह अलग। ऐसे में सबको उम्मीद है कि जो आएगा, वह उनसे बेहतर होगा।

साहब नहीं कारिंदों को दिक्कत

खेती-बाड़ी वाले विभाग के आला अफसर की छवि को उनका ही कारिंदा नुकसान पहुंचा रहा है। यह कारिंदा आला अफसर के नाम पर लोगों से फरमाइश भी करने लगे है। विभागीय अधिकारी उसकी फरमाइश से परेशान हैं। कोई अधिकारी मिलने की जुर्रत करता है तो उसे भी कारिंदे को चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। मिलने से पहले पूरी वजह बतानी पड़ती है। किसी की मजाल नहीं है कि इस कारिंदे को नजरअंदाज करके साहब तक पहुंच जाए। ऐसे में अब विभाग में इस कारिदे की चर्चा जोरों पर है क्याोंकि आला अफसर का इतिहास रहा है कि उन्हें किसी से मिलने में कभी कोई दिक्कत नहीं होती।



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *