
मुगलकालीन रामायण
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मुगल काल में भी राम की आभा रही। इस दौर में बादशाहों से लेकर ओहदेदारों के अपने राम और अपनी रामायण रही। रामायण को किसी से साझा नहीं किया। अकबर ने रामायण का फारसी में अनुवाद कराया था। इसी समय रामचरित मानस भी फारसी में अनूदित होकर आई थी। शाहजहां की हुकूमत में भी राम का काम हुआ। तब मुल्ला शेख सादुल्ला और गुलामदास ने अनुवाद किए थे। यह भी फारसी में थे। अब अयोध्या शोध संस्थान (अंतरराष्ट्रीय रामायण एवं वैदिक शोध संस्थान) इन्हें एक जगह लाने की तैयारी कर रहा है।
राम की मर्यादा, त्याग, युद्ध कौशल और राज करने की कला के मुगल भी कायल रहे। अकबर ने वाल्मीकि रामायण का फारसी में अनुवाद करवाया था। 1584 से 1588 के बीच यह काम हुआ। मुल्ला अब्दुल कादिर को इसके लिए चुना गया था। इसमें चित्र भी बनवाए गए हैं। इन्हें बासवान, केशव लाल और मिस्कीन ने डिजाइन किया था। इसमें 176 चित्र हैं। यह महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय संग्रहालय जयपुर में है।
