Even today, Lord Ram is adorned with silver jewelery from 1937.

रामलीला का मंचन करते कलाकार।

लखनऊ। लखन नगरी को यूं ही खास नहीं कहते हैं, दशहरा बीतने के बाद भी यहां राम लीलाओं का दौर जारी है। कुछ रामलीलाएं तो दशहरा के बाद शुरु होती हैं।

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चौक के लोहिया पार्क में श्री पब्लिक बाल रामलीला समिति की ओर से होने वाली रामलीला का मंचन दशहरा से शुरु होता है और 15 दिनों तक चलता है। यह रामलीला 1937 से होती आ रही है। खास बात यह है कि यहां 1937 के चांदी के आभूषणों से श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को सजाया जाता है। धनुष, गदा, मुकुट सहित अन्य सजावटी सामान भी उसी समय के हैं। 1937 में इन आभूषणों को खुनखुन जी ने बनवाया था। तब से पीढ़ियां इसे सहेजती आ रही हैं।

समिति के अध्यक्ष कमल किशोर जायसवाल ने बताया कि इस रामलीला में दो मंजिला बिल्डिंग के ऊपर चढ़कर हनुमान, लंका दहन करते हैं। खास बात है कि हनुमान जी का पात्र निभाने वाले उस दिन निर्जला व्रत रखते हैं।

इस रामलीला में कुल 200 कलाकार है जिसमें से सभी व्यापारी हैं।सभी की राम के प्रति अथाह आस्था है जिसकी वजह से काम से छुट्टी लेकर अपने अपने किरदार निभाते हैं। मंगलवार को चौक की रामलीला में करुणानिधान, जानकी जन्म, विश्वामित्र आगमन, ताड़का वध, मारीच सुबाहु वध का शानदार मंचन किया गया।

राम जन्म से लेकर ताड़का वध तक का हुआ मंचन

ट्रांसपोर्टनगर की प्रेम रामलीला समिति की ओर से मंगलवार को रामलीला मंचन के पहले दृश्य में गुरु वशिष्ठ के साथ राजा दशरथ अपने दरबार में विराजमान हैं। दूसरे दृश्य में यज्ञ की तैयारी होती है। राजा दशरथ, दृव्य प्रसाद लेकर रानियों के पास जाते हैं। पटरानी कौशल्या को पुत्र रत्न की प्राप्ति का समाचार मिलता है। इसके बाद रानी कैकेयी और सुमित्रा के भी पुत्रों का समाचार आता है और चारों ओर खुशियां छा जाती हैं। इसके बाद ताड़का वध, गुरु विश्वामित्र का आश्रम यज्ञ, राक्षसी सेना के उत्पात का मंचन दिखाया जाता है। घमासान युद्ध में ताड़का व सुबाहु के वध का मंचन होता है।



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