लखनऊ। गैर हिंदी प्रदेश में जन्म लेकर भी उन्होंने कर्मभूमि बनाया हिंदी पट्टी के प्रदेश को। दो दशकों से भी अधिक समय से उत्तर प्रदेश में रह रहे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों से हमने जानने का प्रयास किया कि वे हिंदी पढ़कर आए या आकर इसे सीखा। जो जवाब मिला वो रोचक था। उन्होंने कहा कि हिंदी ने हमें अपनाया और हम इसमें रम गए। आइए जानते हैं कि हिंदी प्रदेश में आकर काम शुरू करने से अब तक के उनके अनुभव के बारे में।
हिंदी ने दिलाया टीम का सहयोग, मिला अपनापन तो काम हुआ आसान
मिनिस्ती एस, सचिव वित्त विभाग
केरल में हम लोगों को 10वीं तक हिंदी में परीक्षा पास करनी ही थी। हमारी मलयालम भाषा आधी तमिल-आधी संस्कृत आधारित है। हां, व्याकरण के लिहाज से हम मजबूत नहीं हैं। 21 साल हो गए, पर इन वर्षों में मैं अपना का-की-के का अंतर नहीं सुधार पाई। स्त्रीलिंग-पुलिंग के अंतर के कारण मेरी टीम हंसती है, पर मुझे माफ कर देती है। बात उन दिनों की है जब मैनपुरी में डीएम थी। शाम का वक्त था, मीटिंग चल रही थी। अचानक से एक व्यक्ति दौड़ते हुए आया बोला-सांड पागल हो गया है। मैंने सांड से आशय दुखी वाले सैड से लिया। चपरासी ने ऐसे देखा, जैसे सोच रहा हो कि इन्हें कलेक्टर किसने बना दिया। ऐसे कई मौके आए, जब हास-परिहास के बीच टीम के साथ काम करना पड़ा। हिंदी की गिनती मुझे समझ नहीं आती, मैं टीम से पूछती हूं, कोर्ट में कई शब्दों के अर्थ नहीं समझ पाती तो टीम का सहयोग लेती हूं। सच कहूं तो हिंदी ने रिश्ते बनाए, टीम का सहयोग मिला और काम आसान हो गया,ये हिंदी की ताकत है।
लोग मुझसे अंग्रेजी में बात करते और मैं हिंदी में जवाब देता
एमके शनमुगा सुंदरम, प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा
मूल रूप से तमिलनाडु का हूं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में पहली पोस्टिंग थी। तमिलनाडु के कोयंबटूर और उत्तर प्रदेश के लखनऊ में कुछ समानता है। यहां लोग आप और पहले आप जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह स्थानीय तमिल भाषा में बड़े-बूढ़े भी बच्चों-युवाओं से एकवचन नहीं बहुवचन में संबोधित करते हैं। इस समानता ने मुझे बल दिया। शुरुआती दौर में कुछ दिक्कत हुई। स्त्रीलिंग-पुलिंग का अंतर आज भी नहीं समझ पाता। शुरुआत में सभी मुझे दक्षिण भारतीय जानकर अंग्रेजी में बात करते, मैं हिंदी में जवाब देता। मैंने फाइलों में नोटिंग आदि के लिए हिंदी को अपनाना शुरू किया और धीरे-धीरे इसकी आदत हो गई। हां, मेरी दोनों बेटियां बहुत अच्छी हिंदी बोलती हैं और अक्सर मुझे और पत्नी को हमारी टूटी-फूटी हिंदी के लिए उनकी हंसी का पात्र भी बनना पड़ता है।
हमारे घर में 70 फीसदी हिंदी बोली जाती है और हिंदी अखबार भी आता है
डॉ. राजशेखर, सचिव नमामि गंगे व ग्रामीण जलापूर्ति
मेरा जन्म कर्नाटक में हुआ। हिंदी को लेकर हम सौभाग्यशाली हैं क्योंकि नवोदय विद्यालय में पढ़ाई और राष्ट्रीय एकीकृत योजना के तहत दो साल बिहार में रहने के कारण हिंदी में संवाद और काम हमारी दिनचर्या का हिस्सा हो गया था। इस कारण हिंदी में उतनी दिक्कत कभी नहीं रही। हां, प्रशासनिक सेवा में आने के बाद हिंदी बोलना-लिखना आने के कारण संवाद स्थापित करने में आसानी रही। दिक्कत आई सरकारी हिंदी को समझने में, क्योंकि वो कुछ क्लिष्ट होती है। छह माह का समय लगा, इसे सीखने में। ये हिंदी की ताकत है कि हमारे घर में 70 से 80 फीसदी हिंदी बोली जाती है। अंग्रेजी अखबार के साथ हिंदी अखबार आता है।
