झांसी। मेडिकल कॉलेज में रोगियों की जांच के शुल्क से जेब भरने के खुलासे की जांच अब तक ठंडे बस्ते में है। इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय ने जांच के आदेश दिए थे। पांच सदस्यीय टीम भी गठित हुई, लेकिन 142 दिन गुजर जाने के बावजूद जांच एक कदम आगे नहीं बढ़ सकी है।
अमर उजाला ने 15 अप्रैल को ‘खजाने के बजाय अपनी जेब में डाला जा रहा मरीजों की जांच का पैसा’ शीर्षक से खबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी। इसमें खुलासा किया था कि मेडिकल कॉलेज के कुछ कर्मी सरकारी खजाने में सेंध लगा रहे हैं। भर्ती रोगियों के उपचार (एंजियोप्लास्टी व डायलिसिस) की राशि खजाने के बजाय जेब में डाली जा रही है। खास बात यह कि रोगी को दी जाने वाली बिल रसीद में भुगतान की राशि अंकित होती है, जबकि डुप्लीकेट बिल रसीद में जमा की राशि शून्य अंकित होती है। खुलासा किया था कि 65 वर्षीय जगत सिंह, 67 वर्षीय जमाना देवी, 66 वर्ष सात माह के प्रकाश चंद्रा, 63 वर्ष की रामदेवी की एंजियोप्लास्टी, ईसीजी अथवा डायलिसिस की राशि जेब में डाली गई है।
ये हैं जांच टीम में शामिल
इस मामले को मुख्यमंत्री कार्यालय ने गंभीरता से लेते हुए टीम गठित करके जांच के आदेश दिए थे। तत्कालीन प्राचार्य प्रो. शिव कुमार ने जांच के लिए पांच सदस्यीय टीम बनाई। उसमें वर्तमान प्राचार्य डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. खुश्तर हैदर, डॉ. नीरज कुमार बनौरिया, वित्त अधिकारी और मेडिकल चौकी इंचार्ज को शामिल किया गया। डॉ. सुधीर कुमार के प्राचार्य बनने के बाद डॉ. खुश्तर हैदर टीम के नोडल अधिकारी बन गए। टीम गठित होने के करीब साढ़े चार महीने बाद भी जांच शुरू नहीं हुई है।
मामला पेचीदा है : डॉ. हैदर
जांच टीम के नोडल अधिकारी डॉ. खुश्तर हैदर का कहना है कि यह मामला काफी पेचीदा है। इसलिए चार दिन पहले सीएमएस को पत्र सौंपते हुए जांच टीम गठित करने के लिए कहा है। उल्लेखनीय है कि इस मामले में जांच टीम पहले ही गठित हो चुकी है, लेकिन अब फिर से टीम बनाने की मांग की जा रही है।
