गोवर्धन पर्वत की तलहटी में बसे डीग के गांव बहज में चल रही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई में पता चला है कि इस क्षेत्र में आदिमानव घूमते रहे हैं। यहां पत्थर से निकले फ्लैक्स (पपड़ियों) से बनाए गए औजार मिले हैं जिन्हें पाषाण काल का माना जा रहा है।
इसके अलावा अन्य कई संस्कृतियों की प्रमाण भी मिले हैं। डेढ़ साल तक खुदाई के बाद अब यह साइट बंद करते हुए इसमें मिट्टी भर दी गई है। सभी सैंपल कार्बन डेंटिंग के लिए भेज दिए गए हैं ताकि सटीक निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके। डेढ़ साल पहले बहज गांव के टीले पर खुदाई शुरू हुई थी। इस टीले को पुरातत्वविद गोवर्धन का ही हिस्सा मानते हैं।
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पत्थर पर उकीर्ण आकृतियां
– फोटो : विभाग
जैसे-जैसे खुदाई आगे बढ़ती गई, पुरातत्वविदों की आंखें चमकती गईं। यहां लगभग 4800 साल पुरानी गणेश्वर सभ्यता के बर्तन मिले तो साथ ही लगभग तीन हजार साल पुरानी शिव पार्वती की प्रतिमा भी मिली। ऐसे प्रमाण भी मिले जिन्हें महाभारत काल से जोड़ा जा जा रहा है। हालांकि एएसआई इस काल की पुष्टि नहीं करता है। सबसे अहम है कि यहां आदिमानव के अस्तित्व के प्रमाण मिले हैं।
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निशानदेही करते पुरातत्वविद
– फोटो : विभाग
इस खुदाई का नेतृत्व कर रहे अधीक्षण पुरातत्वविद् विनय कुमार गुप्ता बताते हैं कि इन जमावों में प्रागैतिहासिक काल के मानव निर्मित औजार मिले हैं। हालांकि उनकी बसावट का निश्चित प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन औजार इस क्षेत्र में उनके अस्तित्व को बताते हैं।
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खोदा गया टीला
– फोटो : विभाग
इससे माना जा सकता है कि आदिमानव गोवर्धन पर्वत या आसपास विचरण करते थे। ये औजार लगभग एक लाख साल पुराने हो सकते हैं, लेकिन इनका सही पता कार्बन डेटिंग होने के बाद ही चलेगा। हालांकि यह भी दिख रहा है कि ये स्थानीय स्तर पर ही बनाए गए औजार हैं। औजार बनाने की तकनीक उनके पास कहां से आई, यह अध्ययन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
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पत्थर पर उकीर्ण आकृतियां
– फोटो : विभाग
लुप्त नदी का मिलना बड़ी सफलता
इस खुदाई में एक लुप्त नदी का चैनल मिला है जो बेहद अहम माना जा रहा है। इसे सरस्वती की लुप्त धारा भी माना जा रहा है, लेकिन पुरातत्वविद इस पर फिलहाल मुहर नहीं लगा रहे हैं। उनका कहना है कि सबसे पहले यह पता चले कि वास्तव में यह कब सूखी। चूंकि जिस नदी को सरस्वती कहा गया है वह हड़प्पा काल तक थी।