दो बच्चों की मां ने पड़ोसी युवक पर अपहरण करने, एक माह तक बंधक बनाकर दुष्कर्म करने और जानमाल की धमकी देने का आरोप लगाया। युवक को जेल जाना पड़ा। जमानत तो मिल गई लेकिन मुकदमा लड़ऩे में अदालत के चक्कर काटते-काटते उसकी चप्पलें घिस गईं। 13 साल बाद आखिर उसे इंसाफ मिल गया। फास्ट ट्रैक कोर्ट 41 के न्यायाधीश पीयूष सिद्धार्थ ने पीड़िता व उसके पति के बयानों में कई अंतर होने पर संदेह का लाभ देते हुए उसे आरोपों से बरी कर दिया।

गोविंदनगर निवासी महिला ने कोर्ट के आदेश पर रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि एक मार्च 2012 की दोपहर पड़ोसी संजय वाल्मीकि घर आया। प्रसाद में नशीला पदार्थ मिलाकर खिला दिया। भांजे की शादी के लिए अलमारी में रखे रुपये व जेवर निकाल लिए और उसे बदहवास हालत में साथ ले गया। रास्ते में एक कार में बैठाया जिसमें दो और लोग मौजूद थे फिर सामूहिक दुष्कर्म किया। कुछ सुंघाने पर वह बेहोश हो गई तो संजय उसे एक कमरे पर ले गया जहां बंधक बनाकर एक माह तक दुष्कर्म किया।

संजय के मां-बाप ने भी उसका साथ दिया। दो अप्रैल को संजय और उसके मां-बाप महिला को कचहरी लाए और वकील के बस्ते पर छोड़कर भाग गए। विवेचना के बाद सिर्फ संजय के खिलाफ ही चार्जशीट कोर्ट भेजी गई थी। अभियोजन ने पीड़िता व उसके पति समेत छह गवाह कोर्ट में पेश किए। पीड़िता और उसके पति के बयान में कई विरोधाभास थे। विवेचक के अनुसार दो अन्य व्यक्तियों के शामिल होने के साक्ष्य भी नहीं मिले। 27 जुलाई 2012 को हुए पीड़िता के मेडिकल में भी कोई चोट नहीं मिली थी। अभियोजन की कहानी कोर्ट में साबित नहीं हो सकी और कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए संजय को बरी कर दिया।

पीडि़ता व पति के बयानों में मिला अंतर

1- पीड़िता ने कहा था कि संजय व उसके माता-पिता उसे कचहरी छोड़कर चले गए थे जबकि पीड़िता के पति ने बयान में कहा था कि जब वह पीड़िता के फोन पर उसे कचहरी लेने आया तो संजय और उसके माता-पिता मौजूद थे। उन्होंने उसे धमकाया था।

2- पीड़िता ने कहा था कि घटना के दिन बच्चे स्कूल गए थे जबकि पति ने कहा कि बच्चे एक घर में झाड़ू पोछा का काम करने गए थे।

3- पीड़िता ने कहा कि 50 हजार रुपये निकाले जबकि पति ने कहा कि पांच हजार रुपये निकाल लिए थे।

 



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