सचिन, 11वीं का छात्र और एनसीसी कैडेट, सेना में भर्ती होने का सपना देखता था। रोज सुबह दौड़ लगाने वाला यह होनहार युवक अब सिर्फ यादों में है। मां पप्पी देवी बार-बार बेटे का नाम पुकारती रहीं, जबकि पिता रामवीर का गम से चेहरा पत्थर हो गया।
दीपक, चार भाइयों में सबसे छोटा, छह साल पहले पिता को खो चुका था। जब सेना ने उसका शव निकाला, तो बहन नीलम बेहोश होकर गिर पड़ी। मां तुलसी देवी और भाइयों मोनू, सुदामा, नंदकिशोर का रो-रोकर बुरा हाल रहा।
गजेन्द्र, तीन भाइयों में सबसे छोटा, मजदूरी करके घर चलाता था। मां कमलेश देवी और बहन आरती का रो-रोकर बुरा हाल था। सबसे दर्दनाक मंजर यादव सिंह के परिवार का रहा—हादसे में उनके दोनों बेटे गगन और हरेश ने जान गंवाई। घर के दोनों चिराग बुझने से माता-पिता सदमे में हैं।
छह दिन तक चले सर्च ऑपरेशन में सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और पुलिस की 11 थानों की टीमें जुटीं। हजारों ग्रामीण घटनास्थल पर पहुंचे। पुलिस आयुक्त दीपक कुमार ने खुद मोर्चा संभाला। आख़िरी शव मिलने के बाद गांव में सन्नाटा छा गया। कुसियापुर ने अपने 12 बेटों को खो दिया, साथ ही खो दिए वे सपने जो अब केवल यादों और आंसुओं में बचे हैं।
