अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और नगर निगम के बीच नगला पटवारी स्थित करीब 500 करोड़ रुपये की जमीन के विवाद मामले में बुधवार को एसडीएम कोल न्यायालय में सुनवाई हुई। इसमें नगर निगम ने एएमयू की ओर प्रस्तुत की गई 1941 की पंजीकृत डीड के प्रावधानों में ही अपने स्वामित्व का दावा तलाश कर उसे पेश किया। नगर निगम की ओर से सहायक नगर आयुक्त तपस्या यादव ने एसडीएम न्यायालय में इस बाबत प्रतिवेदन दिया।
इनमें नगर निगम की ओर से तर्क दिया गया है कि एएमयू की ओर से प्रस्तुत किया गया 25 जनवरी 1941 का पंजीकृत विलेख (रजिस्टर्ड डीड) ही उनसे दावों की पोल खोलता है। 1925 की अधिसूचना के अनुसार विश्वविद्यालय निर्माण के लिए 324.15 एकड़ जमीन का प्रस्ताव था, जिसमें से मात्र 197.57 एकड़ जमीन (शिड्यूल-1) ही एएमयू को दी गई थी। बाकी बची 126.58 एकड़ जमीन (शिड्यूल-1ए) को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया गया था। वाद से संबंधित गाटा इसी शिड्यूल-1ए में आते हैं इसलिए इस पर एएमयू का कोई मालिकाना हक नहीं है।
नगर निगम ने ये दलील भी दी कि राजस्व अभिलेखों (कलेक्ट्रेट अलीगढ़ के दस्तावेजों) के अनुसार, वर्ष 1356 फसली तथा आधार वर्ष 1359 फसली और उसके बाद से लगातार यह भूमि राजस्व अभिलेखों में ऊसर व अन्य बंजर के रूप में दर्ज चली आ रही है। चूंकि यह भूमि ग्राम सभा की संपत्ति रही है और समय के साथ यह क्षेत्र नगर निगम सीमा में आ गया इसलिए उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम तथा नगर निगम अधिनियम के प्रावधानों के तहत यह स्वतः नगर निगम की निहित संपत्ति बन जाती है।
